सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८६ सात्वतसंहिता यहाँ तक पीठ का निर्माण कहा। अब प्रासाद निर्माण का विधान कहा जा रहा है। शुभ दिन में, अनुकूल नक्षत्र में, प्रशस्त ग्रह होने पर, स्थिर लग्न, स्थिर लग्न के स्थिरांश में, उत्तरायण में, दिव्यादि उत्पात से रहित काल में, शुक्ल पक्ष में, निर्मल आकाश होने पर पृथ्वी में किये गये खात को जल से पूर्ण कर लेने पर, शल्यादि अपनयन से, भू-पूजन से, भू-भाग के शुद्ध कर लेने पर उसको सर्वलक्षण लक्षित होने पर ऐसे सुन्दर उपलिप्त धरातल में सूत्र के द्वारा चारों दिशाओं में उसके ६४ बराबर-बराबर भाग कर लेने पर यजमान स्नान कर, शुक्ल वस्त्र धारण कर, माला पहन कर न्यास करे। बुद्धि स्थिर रखे, सर्व साधन से संयुक्त हो, अर्घ्य पात्र से समन्वित माङ्गलिक घड़ा लेकर हृदय में अच्युत का ध्यान करते हुए सदागम परायण, एकायन विप्रों के साथ तथा मूल से ही भगवद् भक्तिमय ऋग्वेदी ब्राह्मणों के साथ प्रासाद के भूभाग में प्रवेश करे। मध्य में कुम्भ स्थापित कर भूमि का निरीक्षण करे। भूमि का सन्ताडन करे, तदनन्तर प्रोक्षण करे। अस्त्रोदक के साथ पञ्चगव्य से सेचन करे ॥ २८२-२८९ ॥ ओंङ्गाराद्यं पवित्रान्तं मन्त्राणां प्राक् चतुष्टयम् । पाठयेच्च सपुण्याहं ब्राह्मणान् कृतमण्डनान् ॥ २९० ॥ बाह्वृचं शाकुनं सूक्तं ततो भद्रं यजुर्मयान् । इडा मायेति सामज्ञान् शान्ता द्यौरित्यथर्वणान् ॥ २९१ ॥ सर्वप्रथम ॐकारादि से लेकर पवित्रान्त चार मन्त्र का पाठ करावे। फिर भूषित ब्राह्मणों से पुण्याहवाचन करवाए। यजुर्वेदी ब्राह्मणों से बह्वृच शाकुन सूक्त, तदनन्तर 'भद्रं कर्णेभिः' इत्यादि मन्त्र का पाठ करावे। 'इडा माया' इस मन्त्र का सामवेदियों से तथा 'शान्ता द्यौः' इस मन्त्र का अथर्ववेदियों से पाठ करवाए ॥ २९०-२९१ ॥ ईशकोणात् समारभ्य प्रागादौ प्रतिपङ्क्तिषु । द्वादशाक्षरमन्त्रेण स्वनाम्ना तु पदे पदे ॥ २९२ ॥ नतिप्रणवगर्भेण दैवतं देहलक्षणम् । यष्टव्यो वास्तुपुरुषो दधिस्रक्चन्दनादिना ॥ २९३ ॥ पूर्व से प्रारम्भ कर ईशानकोण पर्यन्त प्रत्येक पङ्क्ति में द्वादशाक्षर मन्त्र से, जिसके प्रत्येक पद में अपने नाम के साथ नमस्कार युक्त प्रणव मध्य में हो, ऐसे मन्त्र से देहधारी देवता वास्तुपुरुष का दधि, माला तथा चन्दनादि द्वारा साधक को पूजन करना चाहिए ॥ २९२-२९३ ॥ सात्त्विकेनोपहारेण अग्नौ सन्तर्पयेत् ततः । कुर्यात् कुम्भप्रतिष्ठानं यथा तदवधारय ॥ २९४ ॥