सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५८७ तदनन्तर सात्त्विक उपहार से अग्नि में उनका सन्तर्पण करे। अब जिस प्रकार वहाँ कुम्भ स्थापित करना चाहिये उस विधि को सुनिये ॥ २९४ ॥ पूर्ववत् तोरणाद्यैस्तु भूभागमुपशोभयेत् । कर्णिकालयवक्त्रस्य अग्रतस्तत्क्षितर्बहिः ॥ २९५ ॥ सर्वोपकरणोपेतं कुर्यान्मण्डपमुत्तमम् । कुण्डाष्टकान्तरस्थं च स्थलं तत्राष्टहस्तकम् ॥ २९६ ॥ सर्वप्रथम प्रासाद के भूमिभाग को तोरणादि द्वारा सजावे। इसके बाद कर्णिका वलय वक्त्र के आगे, उस पृथ्वी से बाहर सभी उपकरणों से युक्त मण्डप निर्माण करे। वहाँ आठ कुण्डों का निर्माण करे जिसके मध्य का अन्तर आठ हाथ का हो ॥ २९५-२९६ ॥ सपिण्डिका द्विहस्तास्तु कुण्डाः पूर्वोक्तलक्षणाः । त्रिहस्तापचिता वीथी स्यादेवं द्विनवः शमः ॥ २९७ ॥ वहाँ दो हाथ की पिण्डिका तथा पूर्वोक्त लक्षण युक्त कुण्ड का निर्माण करे। वीथी तीन हाथ की इस प्रकार अट्ठारह शम बनावे ॥ २९७ ॥ पूर्ववत् प्रतिकुण्डे तु विनिवेश्यं च साधनम् । आत्मनश्चोत्तरे कुर्यात् कुण्डं चाथ समस्थले ॥ २९८ ॥ प्रत्येक कुण्ड पर साधन सामग्री स्थापित करे। अपने उत्तर दिशा में समतल भूमि पर कुण्ड निर्माण करे ॥ २९८ ॥ दक्षिणे पूर्ववद् देवमवतार्य यजेत् क्रमात् । स्थलायां स्थण्डिलस्योर्ध्वे उन्नतायां च पूर्ववत् ॥ २९९ ॥ अपने से दक्षिण, पूर्व की भाँति स्थण्डिल के ऊपर उन्नत स्थल में देव को पीठ से उतार कर क्रमशः यजन करे ॥ २९९ ॥ तर्पयित्वा यथाकाममुद्धृत्याग्निगणं ततः । दिक्कुण्डेषु विनिक्षिप्य संस्कृतेषु च पूर्ववत् ॥ ३०० ॥ इस प्रकार यथेष्ट सन्तृप्त करने के अनन्तर स्थण्डिल स्थल में से अग्निगणों को उठाकर सुसंस्कृत दिक्कुण्डों में स्थापित करे ॥ ३०० ॥ तथैव च विदिकस्थेषु उद्धृत्याभ्यर्च्य वै क्रमात् । ततः प्रभवयोगेन चतुर्दिक्षु निवेशयेत् ॥ ३०१ ॥ चतुरो वासुदेवादीन् नाम्ना एकायनान् द्विजान् । स्वाभिः स्वाभिरसंख्यं तु तैः कार्यमभिधाय च ॥ ३०२ ॥