भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 649

५९० सात्वतसंहिता तदाधारशिलां पश्चात् तत्र वा मण्टपाद् बहिः । एवमेव च संस्कृत्य भावयेत् प्रणवेन तु ॥ ३१८ ॥ शिला पर इस प्रकार पूजन करने के पश्चात् उन कलशों को कुण्ड के सन्निधि में ले जावे । फिर शिला सहित समस्त कुम्भ वृन्द को आधार पर स्थापित करे । तत्पश्चात् उस आधार शिला को वहीं अथवा मण्डप से बाहर सुसंस्कृत करे और प्रणव मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे ॥ ३१७-३१८ ॥ ज्वलन्तीं गोसहस्रेण खचितां सूर्यबिम्बवत् । ततश्चाराध्य मन्त्रं तु सन्तर्प्य शतसंख्यया ॥ ३१९ ॥ मध्ये तत्कलशं न्यस्य साङ्गं सपरिवारकम् । निःशेषशक्तिगर्भं तु व्यापकं ब्रह्मतत्त्ववित् ॥ ३२० ॥ अत ऊर्ध्वं तिर्यगाभिर्वागाद्याभिश्च शक्तिभिः । व्रतमूर्तिसमेताभिरभिन्नाभिस्तु तत्त्वतः ॥ ३२१ ॥ पाठयेद् ब्राह्मणांस्तत्र आत्मव्यूहं तु मन्त्रराट् । तथैवात्मानुभावाय प्रणवाद्यन्तगं तु वै ॥ ३२२ ॥ उसमें सूर्य बिम्ब के समान हजारों किरणों से देदीप्यमान होने की भावना करे और तदनन्तर सौ संख्या में सन्तर्पण करे । इस प्रकार मन्त्राराधन करे । मध्य के कलश में साङ्ग सपरिवार एवं हृदय में समस्त शक्तियों को धारण किये व्यापक ब्रह्मतत्त्व का न्यास करे । उस कलश के ऊपर तिरछे व्रत मूर्ति समेत अभिन्न रूप से स्थित वागादि शक्तियों से तत्त्वतः न्यास करे । वहाँ ब्राह्मणों से आत्मव्यूह मन्त्रराट् का पाठ करावे । इसी प्रकार अपने ज्ञान के लिये अन्त में तथा आदि में प्रणव का पाठ करावे ॥ ३१८-३२२ ॥ तमर्चयित्वा विधिवत् तर्पयित्वा त्वनन्तरम् । दिक्स्थितानां च कुम्भानां वासुदेवादिकान् न्यसेत् ॥ ३२३ ॥ इस प्रकार विधिवत् उनकी अर्चना कर, तदनन्तर तर्पण कर, दिशाओं में स्थापित कुम्भों पर वासुदेवादि का न्यास करे ॥ ३२३ ॥ पूर्ववच्चानिरुद्धाद्यान् विदिक्संस्थापितेषु च । पाठयेच्चातुरात्मीयं संज्ञामन्त्रचतुष्टयम् ॥ ३२४ ॥ विदिक् (कोणों) पर स्थापित कुम्भों पर अनिरुद्धादि का न्यास करे । फिर चातुरात्मीय चार संज्ञा मन्त्रों का पाठ करावे ॥ ३२४ ॥ प्रभवाप्यययोगेन ततः सूक्तं तु पौरुषम् । ऋग्वेदान् पाठयेद् भक्त्या युञ्जतेत्यपरान् यजुः ॥ ३२५ ॥