भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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चतुर्विंशः परिच्छेदः ५९१ रथन्तराख्यं यत्साम सामज्ञान् भगवन्मयान् । सहस्रशिरसं चेति मन्त्रांश्चाथर्वणांस्ततः ॥ ३२६ ॥ फिर सृष्टि एवं संहार क्रम से ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का पाठ करावे । तदनन्तर भक्तिपूर्वक 'युञ्जते' इस यजुर्वेद का यजुर्वेदी ब्राह्मणों से पाठ करावे । फिर 'रथन्तराख्यं यत्साम' इस सामवेद का सामवेदी भगवन्मय ब्राह्मण से गान कराए । फिर 'संहस्रशिरसं च' इस अथर्ववेद के मन्त्र का अथर्ववेदी ब्राह्मण से पाठ करावे ॥ ३२५-३२६ ॥ एकस्मिन् वा महाबुद्धे सर्वोक्तं कलशे हितम् । तथैव हवनं कुण्डे मध्यमे विहितं स्वयम् ॥ ३२७ ॥ किन्तु क्रमेण वै मन्त्रान् पाठयेच्च यथास्थितान् । एवं सम्पातहोमं तु कृत्वा पूर्णान्तिकं ततः ॥ ३२८ ॥ अथवा हे महाबुद्धे यह सर्वोक्त एक कलश पर भी पाठ कराना हितकारक होता है । इसी प्रकार स्वयं द्वारा हवन भी एक मध्यम कुण्ड पर विहित है । किन्तु इन मन्त्रों का जिस प्रकार वे स्थित हैं उसी प्रकार से पाठ करावे । इसी प्रकार 'सम्पात होम' भी पूर्णाहूति पर्यन्त करावे ॥ ३२७-३२८ ॥ महाशक्तिसमूहस्तु परः सामर्थ्यलक्षणः । अभेदेन च मन्त्रादिमूर्तीनां यः स्थितः स्फुटम् ॥ ३२९ ॥ स सन्धेयः शिलानां च स्वनाम्ना प्रणवेन तु । ज्ञानभासा निवसति तथाऽनन्तबला प्रभा ॥ ३३० ॥ सर्वगा ब्रह्मवदना द्योतकी सत्यविक्रमा । सम्पूर्णा चेति कथिताः शक्तयो विश्वधारिकाः ॥ ३३१ ॥ महाशक्ति समूह जो सबसे अधिक शक्तिशाली लक्षण वाला है और जो मन्त्र मूर्तियों से भेद रहित होकर स्पष्ट रूप से स्थित है, उसे प्रणव के साथ अपने नाम से शिला में स्थापित करे । उस शिला में ज्ञानमासा, अनन्तवला, प्रभा, सर्वगा, ब्रह्मवदना, द्योतकी, सत्यविक्रमा, सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाली विश्व- धारिका। इतनी शक्तियाँ निवास करती है ॥ ३२९-३३१ ॥ या शिला कलशाधारसंज्ञा तां विद्धि सर्वगाम् । सामर्थ्यशक्तिसामान्यां निष्कलां पारमेश्वरीम् ॥ ३३२ ॥ जिस शिला का नाम कलशाधार है साधक को उसे सर्वगा समझना चाहिये तथा जो शिला सामान्य सामर्थ्य शक्ति वाली है, उसे निष्कला पारमेश्वरी शक्ति जानना चाहिये ॥ ३३२ ॥