सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९२ सात्वतसंहिता सन्तर्प्य मूलमन्त्राच्च शिखामन्त्रेण लाङ्गलिन् । अजस्य नाभावध्येकमन्त्रेणैकायनैस्ततः ॥ ३३३ ॥ तादर्थ्येन तु होतव्यमृङ्मयैस्तु तथैव हि । होतव्यमस्यवामीयं गायत्रीभिरतोऽपरैः ॥ ३३४ ॥ हे सङ्कर्षण ! उन शिलाओं का मूल मन्त्र से तथा शिखा मन्त्र से सन्तर्पण करे । इसके बाद 'अजस्य नमः' पर्यन्त इसी एक मन्त्र से एकायन लोग घृताति से होम करें । ऋग्वेद भी उसी प्रकार 'अस्य वामीयम' इस मन्त्र से, इसके अतिरिक्त अन्य लोग गायत्री मन्त्र से होम करे ॥ ३३३-३३४ ॥ होतव्यं ब्राह्मणैः सम्यक् तद्व्याप्तेरुपलक्षकैः । दत्वा पूर्णां स्वयं कृत्वा स्थलस्थस्यार्चनं पुनः ॥ ३३५ ॥ ब्राह्मण लोग ब्रह्मव्याप्ति के उपलक्षक मन्त्रों से होम करें । तदनन्तर स्वयं पूर्णाहुति कर स्थल का अर्चन करे ॥ ३३५ ॥ बलिदानं च भूतानां समाचम्य ततो व्रजेत् । प्रासादब्रह्मभूभागं न्यसेत् तत्र महाशिलाम् ॥ ३३६ ॥ संस्मरंश्चक्रमन्त्रं तु सानन्तं प्रणवेन वै । बीजभूतं तदन्तःस्थमध्वषट्कं स्मरन् यजेत् ॥ ३३७ ॥ इसके बाद भूतों को बलिदान देकर, आचमन कर, जहाँ प्रासाद ब्रह्म का भूभाग है वहाँ स्वयं जावे और प्रणव के साथ अनन्त के सहित चक्र मन्त्र का स्मरण करते हुए उस स्थान पर महाशिला स्थापित करे । उसके भीतर रहने वाले बीज भूत षडध्वा का स्मरण करते हुए उस महाशिला का पूजन करे ॥ ३३६-३३७ ॥ निश्शेषमन्त्रवृन्देन तामर्घ्याद्यैरनन्तरम् । द्वारदिग्विीक्षमाणं तु मध्ये मन्त्रघटं न्यसेत् ॥ ३३८ ॥ विशेष मन्त्र समूह से उस शिला पर अर्घ्यदान के अनन्तर द्वार की दिशा की ओर देखते हुए शिला के मध्य भाग में मन्त्रघट स्थापित करे ॥ ३३८ ॥ स्वदिक्ष्वन्यान् यथावस्थान् स्वैः स्वैर्मन्त्रैर्निवेशयेत् । ततः स्वशक्तिपाषाणैरेकैकं स्थगयेद् घटम् ॥ ३३९ ॥ पूरयेदस्त्रमन्त्रेण घटानामन्तरं ततः । मृदुमृद्बालुकाभिस्तु सुधयाऽचलसिद्धये ॥ ३४० ॥ अन्य घटों को अपने-अपने मन्त्रों से अपनी-अपनी दिशाओं में यथावत् स्थित करे । फिर स्वशक्ति वाले पाषाण के साथ एक-एक घट स्थापित करे ।