सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५९३ तदनन्तर घटों के बीच की दूरी घट की स्थिरता के लिये मिट्टी से, बालुका से और चूना से पूर्ण करे ॥ ३३९-३४० ॥ संवेष्ट्य नेत्रवस्त्रैस्तु ऋग्वेदान् पाठयेत् ततः । आ त्वा हार्षेति सूक्तं तु प्रतिष्ठा साम सामगान् ॥ ३४१ ॥ फिर उन घटों को नेत्र वस्त्र से वेष्टित करे । ऋग्वेदियों से 'आत्वा हर्षेति' इस ऋग्वेद के मन्त्र का और 'प्रतिष्ठा साम' इस सामवेद के मन्त्र का सामवेदियों से पाठ करावे ॥ ३४१ ॥ द्वादशाक्षरसंयुक्तं बलमन्त्रं पुनः पुनः । वक्तव्यं ब्रह्मनिष्ठैस्तु प्रणवान्तं सुभावितैः ॥ ३४२ ॥ द्वादशाक्षर संयुक्त बल मन्त्र का पुनः पुनः पाठ करावे । ब्रह्मनिष्ठ विद्वान् अन्त में प्रणव का उच्चारण करे ॥ ३४२ ॥ तदेकतनुतां यातं संस्मरेत् प्रणवेन तु । मूर्त्यादिशक्तिनिष्ठं यन्नामरूपक्रियात्मकम् ॥ ३४३ ॥ द्वादशाक्षरमन्त्रेण भूयः सहृदयङ्गमैः । तत्राराध्यं स्वमूर्तिं तु संयजेत् तेजसां निधिम् ॥ ३४४ ॥ फिर प्रणव के साथ मूर्त्यादिशक्ति निष्ठ जो नाम, रूप, क्रिया उसे एक शरीर में मिला हुआ समझे । फिर सहृदयङ्गम विद्वान् द्वादशाक्षर मन्त्र से आराध्य तेजस की निधि उस स्वमूर्त्ति का यजन एवं पूजन करे ॥ ३४३-३४४ ॥ ततस्त्वों भगवन् भोगैः पाठयेत् पाञ्चरात्रिकान् । अर्चाभि तेति ऋग्वेदानर्चा साम च तद्विदः ॥ ३४५ ॥ फिर पाञ्चरात्रिकों से 'ॐ भगवन् भोगैः' मन्त्र का पाठ करावे, ऋग्वेदियों से ऋग्वेद के 'अर्चाभि' इस मन्त्र का और सामवेदियों से 'अर्चा साम' इस मन्त्र का पाठ करावे ॥ ३४५ ॥ ततः परिगृहीते तु क्षेत्रे देवगृहीयके । द्वादशाङ्गुलमानं तु दिग्विधिक्ष्वष्टकं न्यसेत् ॥ ३४६ ॥ स्नापितं पूजितं सम्यक् शिलानां शुभलक्षणम् । तदन्तः सन्निरोद्धव्या बुद्धिर्धर्मगुणाः क्रमात् ॥ ३४७ ॥ तदनन्तर आराधक द्वारा देवगृह सम्बन्धी उस क्षेत्र को परिगृहीत कर लेने पर दिशाओं और कोणों में बारह अङ्गुल मान वाली सम्यक् स्नापित एवं पूजित तथा शुभ लक्षण युक्त आठ शिलायें स्थापित करे । उसके भीतर बुद्धि तथा धर्म के गुणों को सन्निरोधित करे ॥ ३४६-३४७ ॥