सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५९५ उसका अपने नाम से अर्चन करे । तदनन्तर वहाँ 'क्लीबो न विद्वान्' इस ऋग्वेद का और 'ये देवास्तु' इस यजुर्वेद के मन्त्र का पाठ करावे ॥ ३५४-३५५ ॥ देवव्रतं च सामज्ञान् प्रविश्याभ्यन्तरं ततः । स्थित्वाऽग्रतो मन्त्रमूर्तेरध्वव्याप्तिमनुस्मरेत् ॥ ३५६ ॥ 'देवव्रतम्' इस मन्त्र का पाठ सामवेदी से करावे, इसके बाद भीतर प्रवेश कर मन्त्र मूर्त्ति के आगे खड़े होकर अध्वव्याप्ति का स्मरण करे ॥ ३५६ ॥ बीजतश्चाङ्कुरीभूता पुरस्ताद् व्यक्तिमेति या । प्रासादपीठपर्यन्तं कुम्भाधारोपलात् तु वै ॥ ३५७ ॥ भुवनाध्वा यथावस्थो भावनीयः पुरोदितः । गर्भोच्छ्रायावधिं यावत् पदाध्वानं विलोकयेत् ॥ ३५८ ॥ यह अध्व व्याप्ति जिस प्रकार बीज अङ्कुर रूप से बढ़ते-बढ़ते स्पष्ट रूप से प्रगट दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार कुम्भाधार शिला से प्रासाद पीठ पर्यन्त बढ़ते- बढ़ते 'भुवनाध्वा' दिखाई पड़ता है । उसका ध्यान करे । इसे पहले कहा जा चुका है । गर्भ की ऊँचाई पर्यन्त 'पदाध्वा' का ध्यान करे ॥ ३५७-३५८ ॥ मन्त्राध्वा शुकनासान्तस्तत्त्वाध्वा वेदिकावधिः । कलाध्वाऽनुगलान्तश्च वर्णाध्वा च तदूर्ध्वतः ॥ ३५९ ॥ भुवनासान्त तक 'मन्त्राध्वा' का, वेदिका तक 'तत्त्वाध्वा' का, गले के अन्त तक 'कलाध्वा' का और उसके ऊपर 'वर्णाध्वा' का ध्यान करे ॥ ३५९ ॥ प्रासादलक्षणकथनम् समीकृत्य पुरा सर्वं प्रासादं प्रारभेत् ततः । तलादूनाधिकाच्चैव साङ्गुलैरुचितैः करैः ॥ ३६० ॥ अथ प्रासादलक्षणमाह—समीकृत्य पुरा सर्वं प्रासादं प्रारभेत् तत इत्यारभ्य यावत् परिच्छेदपरिसमाप्ति । अत्र विधिवत् स्थापनं तस्येत्यारभ्य स्थित्यपेक्षावशेनैव ह्यालयस्य तु वै विभो (४०२-४१०) रित्यन्तं द्वारप्रतिष्ठाविधानमुक्तं ज्ञेयम् । एतत्प्रासादप्रतिष्ठां तु बिम्ब- प्रतिष्ठानन्तरं वक्ष्यति ॥ ३६०-४३३ ॥ प्रासाद का लक्षण—तदनन्तर सबको समतल बनाकर तले से कम अथवा अधिक अङ्गुलि सहित हाथ से नाप कर प्रासाद का प्रारम्भ करे ॥ ३६० ॥ द्विद्वादशकरं यावत् तालेनोनाधिकेन तु । शुभाय सिद्धये विद्धि गर्भे देवगृहस्य च ॥ ३६१ ॥