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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 655

५९६ सात्वतसंहिता वह प्रासाद देवगृह के गर्भ में १ ताल से अधिक अथवा न्यून मान में द्वादश हाथ का होना चाहिये । ऐसा प्रासाद कल्याण के लिये अथवा सिद्धि के योग्य समझना चाहिये ॥ ३६१ ॥ कृत्वा क्षेत्राङ्गुलानां च कराणां वा घनं पुरा । त्यजेत् तदष्टभिः सम्यग् यच्छेषं तद्विचार्य च ॥ ३६२ ॥ क्षेत्राङ्गुल को अथवा हाथ को घना बनाकर आठ भाग का त्याग कर जो शेष हो उसमें विचार कर प्रासाद निर्माण करे ॥ ३६२ ॥ एकाद्यष्टमपर्यन्ता ध्वजधूममृगेश्वराः । श्वा च गोखरमातङ्गवायसास्तु ततः शुभाः ॥ ३६३ ॥ एक से लेकर आठ हाथ तक ध्वज, धूम, मृगेश्वर, श्वा, गौ, खर, मातङ्ग और वायस नामक प्रासाद होते हैं, इसके बाद के प्रासाद शुभ होते हैं ॥ ३६३ ॥ एकत्रिपञ्चसप्ताख्याः सर्वत्रैव विधीयते । गर्भषड्भागमानेन तद्बहिर्भित्तिविस्तृतिः ॥ ३६४ ॥ तन्मानं परितस्त्यक्त्वा भित्तिरन्या विधीयते । एवमत्र क्रमेणैव सह भित्तिगणेन तु ॥ ३६५ ॥ गर्भद्विगुणविस्तीर्णं क्षेत्रं देवगृहस्य च । मन्दिरे त्वेकभित्तीये क्षेत्रमानं विधीयते ॥ ३६६ ॥ सर्वत्र एक, तीन, पाँच और सात संख्या में गर्भ का विधान है । गर्भ के छठे भाग के मान के अनुसार उसके बाहर भित्ति का विस्तार करे । चारों ओर उतने ही मान को छोड़कर अन्य भित्ति का निर्माण करे । इसी प्रकार यहाँ क्रम से भित्तिगण के साथ गर्भ के दुगुने विधान में देवगृह के क्षेत्र का निर्माण करे । इस प्रकार एक भित्ति वाले मन्दिर में क्षेत्र का मान होना चाहिये ॥ ३६४-३६६ ॥ गर्भोक्तं तत्रिभागेन युक्तं युक्तेन वर्त्मना । तत्रापि ह्रासवृद्ध्या तु आयशुद्धिं विचारयेत् ॥ ३६७ ॥ गर्भ में जितना परिमाण कहा गया है उसके तीसरे भाग की वीथी बनानी चाहिये । उस प्रासाद के लम्बाई चौड़ाई के ह्रास वृद्धि के अनुसार आयशुद्धि का विचार करे ॥ ३६७ ॥ एवं निर्जगतीकं च भागं पीठविवर्जितम् । प्रासादक्षेत्रमानं च तद्युक्तमवधारय ॥ ३६८ ॥ इस प्रकार पीठ विवर्जित निर्जगती का भाग होता है । हे सङ्कर्षण ! अब

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