भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५९७ प्रासाद और क्षेत्र का जो उचित मान है, उसे समझिए ॥ ३६८ ॥ षड्भागेनाथ पादेन त्रिभागेनोभयात्मिका । विहिता जगती गर्भा तत्क्रियाविस्तृतिर्भवेत् ॥ ३६९ ॥ छः भाग से अथवा पाद भाग से अथवा तीन भाग से अथवा उभयात्मिका जगती गर्भ विहित है उसी की क्रिया से विस्तार होता है ॥ ३६९ ॥ अधिकार्धं चतुर्दिक्षु तत्पञ्चांशैस्तु वै त्रिभिः । तृतीयांशेन वै मध्ये निर्गमस्तु विधीयते ॥ ३७० ॥ उसके चारों ओर अधिक आधा अथवा उसका पञ्चम अंश अथवा तीन अंश का मध्य में निर्गम (निकलने के द्वार) का विधान है ॥ ३७० ॥ कोणात् कोणात् तु वै शेषं भागं भागं प्रवेशयेत् । उच्चं गर्भसमं पीठं तत्पीठेन दलेन वा ॥ ३७१ ॥ पीठोक्तालयपीठस्य लक्ष्मस्थित्यंशकल्पना । चतुर्दिक्षु विधेया वै बहुधाऽनन्तपूर्विका ॥ ३७२ ॥ कोण कोण से शेष का भाग भाग कर प्रवेश करावे । पीठ को ऊँचाई में गर्भ के समान बनावे, अथवा पीठ के समान, अथवा दल के समान बनावे । पीठ में जो आलय पीठ है उसके चारों दिशाओं में बहुधा अनन्त पूर्विका उसमें लक्ष्मी स्थित्यंश की कल्पना करे ॥ ३७१-३७२ ॥ अथोच्छ्रायं तु वै क्षेत्रात् त्रिगुणं मन्दिरस्य च । कुर्यात् त्र्यर्धगुणं चैव द्विगुणं वा यथेच्छया ॥ ३७३ ॥ इसके बाद मन्दिर की ऊँचाई क्षेत्र का तिगुना निर्माण कर अथवा डेढ़ गुना रखे अथवा दुगुना रखे । उसमें अपनी इच्छा है ॥ ३७३ ॥ द्विरेकादशधा कुर्यात् तं च भागैः समं पुरा । विधेयं पीठवत् पश्चादेकांशने मसूरकम् ॥ ३७४ ॥ उसे समान भाग से बाइस भाग में प्रविभक्त करे । पीठ के समान उसका निर्माण करे । पश्चात् एक अंश से मसूरक निर्माण करे ॥ ३७४ ॥ तदूर्ध्वं विहिता जङ्घा गर्भमानेन चोन्नता । भवोपकरणीयाभिर्देवताभिरलङ्कृता ॥ ३७५ ॥ उसके ऊपर गर्भमान की ऊँचाई में जङ्घा निर्माण करे और उसे भवो- पकरणीय देवताओं से अलङ्कृत करे ॥ ३७५ ॥