सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 657, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ें५९८ सात्वतसंहिता जङ्घायामंशयुग्मेन उपर्यूनाधिकेन च । कार्यं शिखरपीठं तु पूर्वलक्षणलक्षितम् ॥ ३७६ ॥ किन्तु प्रवेशनिर्यासौ तत्र चार्धांशसम्मितौ । शिखरं चात्र विहितं भूमिकानवकान्वितम् ॥ ३७७ ॥ जङ्घा में दो अंश से ऊपर कम अथवा अधिक परिमाण का पूर्वलक्षण लक्षित शिखर पीठ निर्माण करे । किन्तु उसमें प्रवेश और निर्यास (निकलने का मार्ग) शिखर का अर्धांश के समान बनावे । किन्तु यहाँ जो शिखर बनावे वह भूमि के नवांश से युक्त निर्माण करे ॥ ३७६-३७७ ॥ संकोच्य तत्पुरासूत्रमादायोन्नतिसम्मितम् । एकस्मादेकवर्णात् तु जङ्घोर्ध्व्यात् प्रसार्य च ॥ ३७८ ॥ संस्पृशेत् शिखरं पीठमञ्जसा तं निरोध्य च । प्रासादाद् बहिराद्यन्त भूभागे त्वमलेक्षण ॥ ३७९ ॥ कर्णादूर्ध्वं नयेत् सूत्रं लाञ्छ्यमानं क्रमेण तु । शिखरोन्नतिपर्यन्तं चतुर्दिक्ष्वेवमेव हि ॥ ३८० ॥ फिर पूर्व के सूत्र को संकुचित कर उसे ऊँचाई के समान नाप कर एक वर्ण वाले एक जङ्घा के ऊर्ध्व भाग से फैला कर शिखर पीठ पर्यन्त ले जावे । फिर उसे अकस्मात् रोक कर प्रासाद के बाहर आदि अन्त वाले भू भाग में, हे महामते! क्रमशः चिह्न युक्त सूत्र को कर्ण से ऊपर शिखर की ऊँचाई पर्यन्त चारों दिशाओं में घुमावे ॥ ३७८-३८० ॥ पर्यटेल्लाञ्छ्यमानं तु कर्णात् कर्णं महामते । यावत् कुमुदपत्राभा सा स्याच्छिखरमञ्जरी ॥ ३८१ ॥ इस प्रकार कर्ण से कर्ण पर्यन्त घुमाई गई वह शिखर मञ्जरी कुमुद पत्र की आभा के समान बन जायेगी ॥ ३८१ ॥ एवमालेख्य दृष्ट्या तु सम्पाद्या तन्तुपाततः । भूमिकाण्डप्रसिद्ध्यर्थं कार्या सा दशधा पुनः ॥ ३८२ ॥ उपरिष्टात् तु भागेन भवेदामलसारकम् । भूमयो भागमानास्तु ततस्तासां समाचरेत् ॥ ३८३ ॥ इस प्रकार दृष्टि द्वारा चित्र बनाकर पुनः सूत्र पात से उसे सम्पादित करे । तदनन्तर भूमि काण्ड की प्रसिद्धि के लिये उस मञ्जरी का दश भाग करे । ऊपर के भाग से वह अमल सार के समान हो जायेगी । फिर उस मञ्जरी की भूमि को मान के अनुसार प्रविभक्त कर देवे ॥ ३८२-३८३ ॥