सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५९९ क्षयवृद्ध्या विधानं तु त्यक्त्वा स्थानं च भूमिकाम् । चतुस्त्रिद्व्येकसंख्यानि सममानाङ्गुलानि च ॥ ३८४ ॥ निजभूमेः समारभ्य तानि योज्यान्यधः क्रमात् । पूर्वभूमेः समारभ्य ह्यधःस्थे भूमिकागणे ॥ ३८५ ॥ फिर उस स्थान तथा भूमिका की क्षय वृद्धि का त्याग कर चार, तीन, एक, अथवा सम मान के अङ्गुलियों से निजभूमि से आरम्भ कर नीचे तक एक भूमि में मिला देवे ॥ ३८३-३८५ ॥ सर्वासां व्यवधानं तु तद् द्विरष्टांशसम्मितम् । विभिन्ना पीठरचना तासु कार्या यथास्थिता ॥ ३८६ ॥ सचक्रैर्विविधैः पद्मैः प्रादुर्भावैस्तु चाखिलैः । सर्वैर्वा लाञ्छनैर्मूर्तैर्नृत्तगीतरसस्थितैः ॥ ३८७ ॥ नवांशेनोर्ध्वभागात् तु स्वपादेन विनिर्गतम् । उष्णीषमूर्ध्वभूमेस्तु कार्यं वै रचनोज्झितम् ॥ ३८८ ॥ सभी भूमि में १६ वे अंश का व्यवधान रखे । उस भूमि पर यथा स्थित विभिन्न पीठ रचना करे । चक्र सहित पद्म का निर्माण करे, अनेक का प्रादुर्भाव करे । सभी प्रकार के लाञ्छन, मूर्ति, नृत्य, गीत और रस की स्थिति करे । ऊर्ध्व भूमि के ऊर्ध्व भाग से नवांश में स्वपाद पर्यन्त उष्णीष निर्माण करे ॥ ३८६-३८८ ॥ शिष्टं कृत्वा त्रिधा पीठमण्डस्यैकेन पूर्ववत् । द्वितीयेन ततः कण्ठं तृतीयेनोर्ध्वगेन तु ॥ ३८९ ॥ सुसमं श्रीयुतं कुर्यादण्डं धात्रीफलान्डवत् । नवधोष्णीषकं कृत्वा चतुर्भिर्वेदिकाभ्रमम् ॥ ३९० ॥ उस पीठ के तीन भाग को शेष रखे । एक से अण्ड निर्माण करे । तदनन्तर द्वितीय एवं तृतीय भाग से कण्ठ निर्माण करे । ऊपर के शेष धात्री फल के अण्डे के समान, शोभा सम्पन्न अण्ड का निर्माण करे । नव भाग से उष्णीष निर्माण करे और चार भाग से गोलाकार वेदी निर्माण करे ॥ ३८९-३९० ॥ त्रिभागपृथुलं कण्ठमण्डं पञ्चाङ्गसम्मितम् । पञ्चधा सप्तधा कृत्वा गर्भं वा नवधा पुरा ॥ ३९१ ॥ विहाय पक्षगौ भागौ मध्यभागगणेन तु । प्रासादनाडिका कार्या गर्भाद्धेन विनिर्गता ॥ ३९२ ॥ तीन भाग से मोटा कण्ड निर्माण करे । अण्ड पञ्चाङ्ग सम्मित निर्माण करे । फिर गर्भ को पाँच, सात अथवा नव भागों में विभक्त कर पक्ष के दो भागों को