सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ६०१ उसे शिखर के चारों ओर पीठ के ऊपर समाप्त करे, रथक युक्ति के समान नासिका मञ्जरीगण का निर्माण करे ॥ ३९९ ॥ मध्यदेशचतुर्दिक्षु कुर्याद् द्वारगणं समम् । त्रिचतुःपञ्चषड्भागे ततो गर्भाद् विधीयते ॥ ४०० ॥ प्रासाद के मध्य देश के चारों ओर बराबर-बराबर मान वाले द्वार समूह का निर्माण करे । ये द्वार गर्भ के तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठें भाग में निर्माण करना चाहिये ॥ ४०० ॥ द्विगुणं चोन्नतत्वेन त्रिपञ्चनवशाखिकम् । युक्तं द्वारस्थद्वयेनैव कुम्भेभदशनैस्तु वा ॥ ४०१ ॥ द्वारों की ऊँचाई गर्भ से दूनी बनावे, जिसमें तीन, पाँच, नव शाखा होनी चाहिये । इन द्वारों पर कलश तथा दशनयुक्त हाथी का निर्माण करावे ॥ ४०१ ॥ विधिवत् स्थापनं तस्य मन्त्रपूर्वं समाचरेत् । संस्नाप्य मूलमन्त्रेण सम्पूज्यार्घ्यादिना हृदा ॥ ४०२ ॥ इन द्वारों पर कलश तथा दशनयुक्त हाथी का स्थापन शास्त्र की दृष्टि से मन्त्रपूर्वक करावे । मूल मन्त्र से इनको स्नान करावे और अर्ध्यादि से नमस्कार- पूर्वक इनका पूजन करे ॥ ४०२ ॥ शाखामूलगतां कुर्याद् धातुरत्नमयीं स्थितिम्। सर्वाधारमयं मन्त्रं सन्निरोध्य हि तत्र च ॥ ४०३ ॥ ज्ञानक्रियात्मकं ध्यात्वा शिखामन्त्रेण शाश्वतम् । दक्षिणोत्तरभागाभ्यां शाखायुग्मं तु विन्यसेत् ॥ ४०४ ॥ शाखा के मूल में धातु तथा रत्न स्थापित करे । उसमें सर्वाधारमय मन्त्र का निरोध कर शिखा मन्त्र से शाश्वत् ज्ञान एवं क्रियात्मक शक्तियों का ध्यान करे तथा दक्षिण और उत्तर भागों में दो शाखायें स्थापित करे ॥ ४०३-४०४ ॥ हृन्मन्त्रेण तदूर्ध्वे तु रुद्ध्वाद्यं परमेश्वरम् । सन्निधीकृत्य सम्पूज्य गगनस्थे हृदम्बरे ॥ ४०५ ॥ उन शाखाओं के ऊपर हृन्मन्त्र (नमः) से आद्य परमेश्वर को अवरुद्ध कर गगनस्थ हृदम्बर में सन्निधान कर पूजन करे ॥ ४०५ ॥ द्विविधं धातुजालं तु रत्नं सिद्धार्थकांस्तिलान् । चन्दनाद्या हि गन्धा ये क्षीरं दधि घृतं मधु ॥ ४०६ ॥ शालयः सर्वबीजानि सर्वौषध्यः सविद्रुमाः । सा० सं० - 42