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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 661

६०२ सात्वतसंहिता कृत्वा नेत्रेण नेत्रस्थान् द्वारोर्ध्वे विनिवेश्य तान् ॥ ४०७ ॥ दो प्रकार के धातुजाल, रत्न, पीली सरसों, तिल, चन्दनादि, गन्ध, क्षीर, दधि, घृत, मधु, शालि, सर्व बीज, सर्वौषधि, सविद्रुम इनको नेत्र से नेत्र में स्थापित कर द्वार के ऊपरी भाग में इन्हें सन्निविष्ट करे ॥ ४०६-४०७ ॥ दृश्यं भोगाप्तये चैव त्वदृश्यं मोक्षसिद्धये । चतुष्यात् सकलो धर्मस्तत्रोर्ध्वं सन्निरोध्य च ॥ ४०८ ॥ चत्वारि शृङ्गा इति यत् पाठयेदृङ्मयांस्ततः । कर्म होमचयं कृत्वा पूर्णां मूलेन पातयेत् ॥ ४०९ ॥ ये दृश्य भोग की प्राप्ति कराते हैं और अदृश्य मोक्ष प्रदान करते हैं। उसके ऊपर चतुष्यात् धर्म को सन्निरुद्ध करे। तदनन्तर 'चत्वारि शृङ्गा त्रयोऽस्य पादा' इत्यादि ऋग्वेद के मन्त्रों को पाठ करावे। फिर उसी मन्त्र से होम कर मूल मन्त्र से पूर्णाहूति करे ॥ ४०८-४०९ ॥ एतद्बिम्बप्रतिष्ठानात् प्राग्वत् पश्चात् समाचरेत् । स्थित्यपेक्षावशेनैव ह्यालयस्य तु वै विभोः ॥ ४१० ॥ यह क्रिया बिम्ब स्थापन से पहले की तरह पश्चात् भी भगवान् के आलय (प्रासाद) की स्थिति की अपेक्षा से करे ॥ ४१० ॥ अनन्तभुवनं नाम सर्वकामापवर्गदम् । चतुष्प्रकारमेवं हि प्रासादं विद्धि पीठवत् ॥ ४११ ॥ इस प्रकार के प्रासाद का नाम अनन्तभुवन है, जो सभी कामनाओं तथा मोक्ष को भी प्रदान करने वाला है। इस प्रकार पीठ के समान यह प्रासाद चार प्रकार का जानना चाहिये ॥ ४११ ॥ रचनासन्निवेशोत्थभेदेनानेकधा तथा । पतत्रीशमृगेन्द्रैस्तु निधिभूतोपमैर्घटैः ॥ ४१२ ॥ शङ्खपद्माङ्किताभिस्तु सोपानपदपङ्क्तिभिः । युक्तं द्वारवशेनैव तथा पीठवशात् तु वै ॥ ४१३ ॥ विस्तारः प्रतिदिक्संस्थस्त्वरुणस्य विधीयते । गर्भोत्थक्षेत्रसंज्ञा च जगतीकस्य लाङ्गलिन् ॥ ४१४ ॥ ये प्रासाद रचना सन्निवेश से उत्पन्न भेदों के कारण अनेक प्रकार के होते हैं। गरुड़ के चिह्न से, मृगेन्द्र के चिह्न से, खजाना स्थापित किये जाने वाले घटों के समान घटों के चिह्न से, शङ्ख, पद्म के चिह्न से, सोपान पद पङ्क्ति के निर्माण

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