सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ६०३ भेद से, द्वार के निर्माण से, पीठ के निर्माण से और प्रत्येक दिशाओं में विस्तार से जो प्रासाद निर्माण किया जाता है । वह 'अरुण' नामक प्रासाद कहा जाता है । हे लाङ्गलिन् ! 'जगतीक' प्रासाद की 'गर्भोत्थ क्षेत्र' संज्ञा है ॥ ४१२-४१४ ॥ ज्ञेयः सजगतीकस्य तन्मानेनापि सर्वदिक् । एभ्यः पादाधिकं कुर्यात् पादाद्यंशोज्झितं तु वै ॥ ४१५ ॥ बुद्ध्वा चायतनानां च संस्थितिश्वाङ्गणे पुरा । चतुरायतनं विद्धि प्रासादैर्दिक्त्रयस्थितैः ॥ ४१६ ॥ आद्येन सह कोणस्थैस्तत्पञ्चायतनं स्मृतम् । विज्ञेयमष्टायतनं त्रिभिरन्यैस्तु दिग्गतैः ॥ ४१७ ॥ क्योंकि सजगतीक प्रासाद का भी वही मान होता है । इनसे एक पाद अधिक अथवा पादाद्यंश से रहित इस प्रकार अङ्गण में आयतनों को समझ कर प्रासाद निर्माण करे । तीन दिशाओं में स्थित प्रासाद की 'चतुरायतन' संज्ञा कही गई है और आदि के साथ कोण में स्थित प्रासाद को 'पञ्चायतन' कहा जाता है । अन्य तीन दिशाओं में होने वाले प्रासाद 'अष्टायतन' कहे जाते हैं ॥ ४१५-४१७ ॥ विना मध्यस्थितेनैव दिग्गतैस्तु द्विभिर्द्विभिः । तद्दशायतनं तेन युक्तमेकाधिकं भवेत् ॥ ४१८ ॥ मध्य स्थिति के बिना दो-दो दिशाओं में दो-दो प्रासाद 'दशायतन' कहे जाते हैं । उसकी अपेक्षा एक प्रासाद अधिक हो, तब उसे 'एकादशायतन' कहा जाता है ॥ ४१८ ॥ प्रतोलीपक्षगेणैव प्रासादद्वितयेन तु । द्वादशायतनं विद्धि सह मध्यस्थितेन तु ॥ ४१९ ॥ तदेवाधिकसंज्ञं तु अतोऽन्योऽनन्तसंज्ञकः । परस्परमुखौ कुर्यात् प्रासादौ द्वारदेशगौ ॥ ४२० ॥ प्रासादाभिमुखाच्चैव दिक्त्रयेऽवस्थितास्तु ये । कोणस्थाभ्यां च साम्मुख्यं द्वाभ्यां द्वाभ्यां विधीयते ॥ ४२१ ॥ प्रतोली (वीथी) तथा पक्षगण से युक्त दो प्रासाद को 'द्वादशायतन' कहा जाता हैं । वही यदि उसी के मध्य में एक प्रासाद और हो तो उसकी अधिक संज्ञा कही गई है । इसके अतिरिक्त अन्य प्रासादों की अनन्त संज्ञा है । द्वार देश पर आमने- सामने मुख वाले दो प्रासाद, प्रासाद के सामने तीन दिशाओं में तीन प्रासाद और दो कोणों के आमने-सामने दो-दो प्रासाद का निर्माण विहित है ॥ ४१९-४२१ ॥ द्वाभ्यामभिमताभ्यां तु कुर्यादुचितदिङ्मुखम् ।