भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 673

६१४ | सात्वतसंहिता स्थलानां वेदिकानां व्यवधानमन्तरालं तलसंमितं द्वादशाङ्गुलमितं कुर्यात् । तथा सति सप्तवेदिकानामन्तरालानि षट्तालमितानि भवन्ति । तथा व्यवधानानवकाशे द्व्यङ्गुलं द्व्यङ्गुलं विना एकापायेन एकताल्हासेन वा व्यवधानं कुर्यात् । क्रमेणाष्टाङ्गुलान्मानात् = प्रत्येकमष्टाङ्गुलव्यवधानात्, स्थलागणं = स्थलसप्तकं, द्विहस्तान्तं = द्विहस्त- परिमितान्तरालं वा कुर्यात् । संकटानां तथा व्यवधानेऽप्यपेक्षमा(णां?णानां) स्थलानां = द्विगोलकं चतुरङ्गुलं व्यवधानं कुर्यात् । ''द्वे अङ्गुले कलानेत्रं गोलकं भाव एव च'' (२४।९४) इति पूर्वमेवोक्तम् । सर्वेषां स्थलानामुच्छ्राय एवमेव परिकीर्तितः । वेदिकानामुच्छ्रायमपि द्वादशाङ्गलमष्टाङ्गुलं चतुरङ्गुलं वा कुर्यादित्यर्थः । परितो वीथेर्मानं स्वपीठजं विहितं चतुर्हस्तमित्यर्थः ॥ २८-३३ ॥ यहाँ तक विभव सम्पन्न लोगों के लिये विधान कहा गया । अब जिनके पास वैभव नहीं है ऐसे वैभवहीन लोगों के लिये विधान कहते हैं— यदि विभूति के अभाव से, या प्रदेश के अभाव से, एक ही गृह में उपरोक्त नयनोन्मीलन, स्नपन, अर्चन, आवाहन, अधिवासादिक समस्त कार्य पृथक्-पृथक् शालाओं में करना संभव न हो, तो वह सारा कर्म एक ही याग गृह में करे । यह जिस प्रकार किया जा सकता है उसके लिये विधि कहते हैं— पैंतीस हाथ लम्बा उसका चतुर्थ भाग चौड़ा याग मण्डप निर्माण करे ॥ २८-२९ ॥ तन्मध्ये तु चतुर्हस्तं त्वापाद्यं स्थलसप्तकम् । स्थलानां व्यवधानं तु कुर्याद् वै तालसम्मितम् ॥ ३० ॥ एकापायेन वै कुर्याद् द्विहस्तान्तं स्थलागणम् । क्रमेणाष्टाङ्गुलान्मानाद् द्व्यङ्गुलं द्व्यङ्गुलं विना ॥ ३१ ॥ स्थलानां संकटानां च व्यवधानं द्विगोलकम् । एवमेव समुच्छ्रायः सर्वासाम् परिकीर्तितः ॥ ३२ ॥ परितो विहितं वीथेर्मानमत्र स्वपीठजम् । उसके मध्य में चार हाथ लम्बी, चार हाथ चौड़ी सात वेदी निर्माण करे । प्रत्येक वेदियों के निर्माण में ताल प्रमाण (बारह अङ्गुल) का अन्तर रखना चाहिये । ऐसा करने से सात वेदिकाओं के कुल अन्तराल छह ताल (बहत्तर अङ्गुल) होता है । यदि उतना व्यवधान न कर सके, तो दो-दो अङ्गुल के व्यवधान से अथवा एक ताल के व्यवधान से ही वेदी निर्माण करे, अथवा क्रमशः आठ अङ्गुल का व्यवधान देकर सात वेदी बनावे, अथवा दो-दो हाथ का व्यवधान कर सात वेदी निर्माण करे, अथवा संकट (कठिनाई) उपस्थित होने पर द्विगोलक (चार अङ्गुल) का व्यवधान देकर सात वेदी निर्माण करे । इन सभी सातों वेदियों की ऊँचाई क्रमशः एक ही समान बारह अङ्गुल की करे, अथवा अष्टाङ्गुल, अथवा चतुरङ्गुल ऊँचाई करे । उसके चारों ओर की वीथी का मान चार हाथ होना चाहिये ॥ ३०-३३ ॥