भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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पृष्ठ 679

६२० सात्वतसंहिता कर्तव्यत्वमुक्तं भवति। तथा चोक्तमीश्वरपारमेश्वरायोः— स्थाप्यमाने बृहद्बिम्बे विशेषः कथ्यते द्विजाः। पूर्ववत् कर्मशालायां संस्थाप्याकारशुद्धये॥ संस्नाप्य विधिना कृत्वा नयनोन्मीलनं ततः। स्नपनं बृहदापाद्य केवलं वा बहूदकैः॥ स्नानकर्म शिलादीनामीषत् कृत्वा तु सार्चनम्। उत्थाप्य मूर्तिपाद्यैस्तु बहुभिस्तु रथस्थितम्॥ समानीय ततो यत्नात् प्रासादाभ्यन्तरं तु वै। यथावद् रत्नविन्यासपूर्वं पीठे निवेश्य च॥ इति। —(ई०सं० १८।७१-७५, पा०सं० १५।१९२-१९५) शिल्पिशालायां केवलं बहूदकैरेव स्नपने कृते बृहत्स्नपनं प्रासादाभ्यन्तर एव कार्यमिति च ज्ञेयम्॥ ५५-५९॥ यदि बिम्ब बहुत बड़ा हो, तब केवल प्रासाद के भीतर उसका प्रवेश करावे। वहाँ रत्नन्यासपूर्वक पीठ पर स्थापित करे। यज्ञशालादि समस्त कर्म ‘कर्म-बिम्ब’ पर करे। लग्नोदय होने पर मन्त्रावाहन एवं सन्निरोध मूल बिम्ब पर ही करे। इसका तात्पर्य यह है कि कर्म बिम्ब पर समस्त यज्ञ शालादिकर्म शीघ्रता से कर ले। लग्नोदय (मुहूर्त्त उपस्थित होने पर) शिल्पिशाला में शीघ्रता से बहूदक स्नान कराकर बृहत्स्नपन एवं मन्त्र सन्निरोध प्रासाद के भीतर मूल-बिम्ब पर ही करे। अतः जिस प्रकार मुहूर्त्त का अतिक्रमण न हो, वैसा करे। ऐसा करने से साधक का कल्याण होता है॥ ५५-५९॥ एवं हि चित्रपूर्वाणामन्येषां कमलेक्षण। सरलब्रह्मपाषाणवर्जितानां समाचरेत्॥ ६०॥ स्नानाद्यं कर्मबिम्बे तु तत्समीपेऽथ दर्पणे। कर्मबिम्बं विना तेषां प्रस्वापाद्यं हि विष्टरे॥ ६१॥ कुर्यात् प्रवेशपूर्वं तु सर्वमुत्सवपश्चिमम्। चित्रबिम्बविषयेऽप्येवमेव कर्मबिम्बे स्नपनाद्यखिलकर्मणामनुष्ठानम्, तस्याभावे दर्पणे छायास्नपनम्, कूर्चद्वारा यागगेहप्रवेशशय्याधिवासोत्सवान्तानां कर्तव्यत्वं चाह— एवं हीति सार्धद्वाभ्याम्॥ ६०-६२॥ हे कमलेक्षण! चित्र बिम्ब के विषय में भी यही विधान कहा गया है। कर्म बिम्ब पर स्नपनादि अखिल कर्म का अनुष्ठान करना चाहिए। यदि उसं स्नानादि का अभाव हो तो दर्पण में छाया स्नपन करे। इसके बाद कूर्च द्वारा यागगेह प्रवेश एवं शय्याधिवास और उत्सव करे। कर्मबिम्ब के बिना ही उस विष्टर पर उन्हें पहले सुलावे इस प्रकार प्रवेश से पूर्व समस्त उत्सव सम्पादन करे॥ ६०-६२॥