सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः परिच्छेदः २७ अभिन्नं मस्तके तावदादित्यातपवन्न्यसेत् ॥ ५१ ॥ व्यापकत्वेन तदनु विन्यसेद् भिन्नलक्षणम् । अङ्गुष्ठद्वितयाद् यावत् कनिष्ठाद्वितयावधिः ॥ ५२ ॥ ज्ञानाद्यं वीर्यपर्यन्तं विन्यसेदङ्गपञ्चकम् । मूलवद् व्यापकत्वेन नेत्रमूर्ध्वाङ्गुलीषु च ॥ ५३ ॥ आब्रह्मरन्ध्रात् पादान्तमथ मन्त्रं तु विग्रहे । ततस्तु हृदये ज्ञानं यतो व्यज्येत तत्र तत् ॥ ५४ ॥ ऐश्वर्यं शिरसो देशे यस्मादुपरि तिष्ठति । प्राकृतं तात्त्विकं वापि सर्वत्र कमलेक्षण ॥ ५५ ॥ हृदग्नेरूर्ध्वगायां तु शिखायां शक्तिमन्त्रराट् । बलं चाखिलगात्राणां तद्गतं वायुना सह ॥ ५६ ॥ मूर्च्छितं सर्वगात्रैर्यत्तद्वीर्यं हस्तयोर्न्यसेत् । अन्तर्बोधस्वरूपं यत् प्राकृतध्वान्तशान्तिकृत् ॥ ५७ ॥ तेजस्तत्तैजसे स्थाने न्यासकाले समस्यते । इदानीमेवं भद्रासनन्यासोक्तिश्चलबिम्बादीनां तदुपरि स्थापनार्थं वा बिम्बाधिकं विना तत्रैवार्चनार्थं वेति ज्ञेयम् । स्थिरबिम्बानां पीठस्तु प्रतिष्ठाकाल एव स्थाप्यते । स्वासनोपवेशनपूर्वकं मन्त्रन्यासविधिमाह—अथोपविश्येत्यादिभिः । अत्र न्यासात् पूर्वं प्राणायामभूतशुद्धेः, मन्त्रन्यासानन्तरं भूषणादिन्यासस्य चानुक्तावपि नृसिंहकल्पे वक्ष्य- माणरीत्या ग्राह्यम् ॥ ५०-५८ ॥ इसके बाद साधक कुशा के आसन पर अथवा काष्ठ के आसान पर अथवा मृग चर्म के आसन पर पद्मासन से बैठकर श्रेष्ठ मन्त्र से न्यास करे । सर्वप्रथम मस्तक पर आदित्य के आतप के समान अभिन्न न्यास करे । इसके बाद व्यापक से अङ्गुष्ठ द्वितय से आरम्भ कर कनिष्ठ द्वितय पर्यन्त भिन्न लक्षण न्यास करे । फिर ज्ञानादि से लेकर वीर्य पर्यन्त पञ्चाङ्गन्यास करे । मूल युक्त व्यापक से नेत्र एवं ऊपर तथा अङ्गुलियों में न्यास करे । फिर शिर से लेकर पाद पर्यन्त शरीर में मन्त्र न्यास करे । हृदय में ज्ञान से न्यास करे क्योंकि ज्ञान हृदय से ही प्रगट होता है । ऐश्वर्य का न्यास शिरःप्रदेश में करे, क्योंकि वह सबसे ऊपर रहता है ॥ ५०-५५ ॥ हे कमलेक्षण सङ्कर्षण ! प्राकृत तथा तात्त्विक न्यास सर्वत्र करे । हृदय रूप अग्नि के ऊपर जाने वाली शिखा में शक्ति मन्त्रराट् से न्यास करे । वायु के साथ समस्त शरीर में सञ्चार करने वाले बल का न्यास समस्त शरीर में करे जो समस्त शरीर में फैल हुआ है । उस वीर्य का न्यास दोनों हाथों में करे जो अन्तःकरण में ज्ञान स्वरूप से बोध कराता है तथा प्राकृत न्यास अन्धकार को (विनष्ट) करने वाला है अतः वह तेज न्यास काल में तैजस स्थान (नेत्र) में स्थापित करे ॥ ५५-५८ ॥