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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

३८ सात्वतसंहिता ऐश्वर्येण तु वीर्येण प्रत्यग्भागेऽवतिष्ठते । तेजःशक्त्यात्मना सौम्ये संस्थितः परमेश्वरः ॥ ७ ॥ तेषां गुणभेदविवरणमाह—अनुज्झितेति द्वाभ्याम् ॥ ६-७ ॥ हे सङ्कर्षण ! वह वासुदेव परं प्रभु परमात्मा पूर्व दिशा से लेकर उत्तर दिशा पर्यन्त गुणभेद से स्वयं अपने आप को विभक्त कर देते हैं, वह पूर्व भाग में अपने स्वरूप को न छोड़कर षाड्गुण्य स्वरूप से स्थित रहते हैं । दक्षिण दिशा में बल और ज्ञान से संयुक्त होकर स्थित रहते हैं । ऐश्वर्य और वीर्य से समन्वित होकर पश्चिम दिशा में स्थित रहते हैं । इसी प्रकार वह परमात्मा तेज और शक्ति से समन्वित होकर उत्तर दिशा में स्थित हो जाते हैं ॥ ५-७ ॥ यद्यप्यरूपो भगवान् व्यूहात्मा गुणलक्षणः । अत्रापि पूर्वमेवोक्तं रूपमस्योपचर्यते ॥ ८ ॥ किन्तु द्वितीयमूर्तेर्वे शुभपाणितलद्वये । स्फुटो रेखामयः शङ्खः सुव्यक्तं लाङ्गलं महत् ॥ ९ ॥ रम्येषुणा तृतीयस्य दक्षिणाश्रिह्नितः करः । तुर्यस्यासिवरेणैव शङ्खाभ्यां च करद्वये ॥ १० ॥ अस्य सुषुप्तिव्यूहस्य पूर्वोक्ततुर्यव्यूहपदरूपत्वाद् गुणमात्रलक्ष्यत्वमेव, तथापि गुणभेदवच्चक्रादिलाञ्छनभेदसत्त्वात् परोक्तं रूपमत्राप्युपचर्यत इत्याह—यद्यपीति त्रिभिः ॥ ८-१० ॥ यद्यपि व्यूहात्मा वासुदेव भगवान् उसी प्रकार गुण लक्षण युक्त एवं अव्यक्त स्वरूप हैं फिर भी द्वितीय परिच्छेदोक्त पर भगवान् का एक मूर्त्यादि स्वरूप यहाँ भी उपचार से जान लेना चाहिए । द्वितीय मूर्ति सङ्कर्षण के दोनों शुभ पाणितल में एक में रेखामय शङ्ख तथा दूसरे में स्पष्ट रूप से लाङ्गल (हल) विद्यमान है। तृतीय प्रद्युम्न के दक्षिण हाथ में सुरम्य बाण का चिह्न तथा चतुर्थ अनिरुद्ध के दाहिने हाथ में तलवार का चिह्न है । इन दोनों के बायें हाथ में शङ्ख विद्यमान है ॥ ८-१० ॥ अवाङ्मुखः करवशादूर्ध्ववक्त्रः स्वभावतः । किन्तु पररूपवद् वरदाभयमुद्रान्वितत्वं विना केवलमवाङ्मुखकरत्वमूर्ध्व- वक्त्रत्वं च चतुर्णामपि विशेषमाह—अवाङ्मुख इति ॥ ११ ॥ एतावता लक्षणेन व्यक्तीभावं गतेन च ॥ ११ ॥ भावस्थितिं निबध्नाति व्यूहेऽस्मिन् साधकस्य तु । सादृश्यात् षड्गुणत्वाच्च समत्वाच्च विशेषतः ॥ १२ ॥ शान्तत्वान्निष्कलत्वाच्च न भेदो विद्यते यतः ।

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