भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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तृतीयः परिच्छेदः ३९ गुणद्वयद्वयेनैव यद्यप्युक्तं पुरा मया ॥ १३ ॥ एकैकं भगवद्रूपं मुख्यवृत्त्या तथापि हि । चतुष्कमवशिष्टं यद् गुणानां समवस्थितम् ॥ १४ ॥ तद् भजेतानुवृत्तिं च एकैकस्य च सर्वदा । एवं लाञ्छनादिभिर्व्यक्तत्वेऽपि सादृश्यादिहेतुभिर्भेदाभावात् साधकस्यान्ुभव- विषयो भवतीत्याह—एतावतेति ॥ ११-१५ ॥ यद्यपि इन चारों मूर्तियों में हाथ के कारण अवाङ्मुखत्व तथा स्वभाव के कारण ऊर्ध्वमुखत्व की विशेषता है । तथापि सादृश्य षाड्गुण्य समन्वय एवं शान्त और निष्फलता के कारण पर और व्यूह का भेद इनमें नहीं है । अतः उक्त भावों •के प्राकट्य से स्पष्ट होने के कारण साधक इस स्वरूप में अपने भावों की स्थिति करता ही है । यद्यपि दो-दो गुणों से ही सङ्कर्षणादि मूर्तिमय का स्वरूप निष्फल हो सकता था, जैसा की प्रथम परिच्छेद में कह दिया गया है, फिर भी उनमें शेष चार गुण भी अनुवृत्ति रूप से रहते ही हैं । इस प्रकार मूर्तिमय में दो-दो गुण व्यक्त रूप से तथा अवशिष्ट चार गुण अव्यक्त रूप से रहते हैं ॥ ११-१५ ॥ एवं ज्ञात्वा स्थितिं ब्राह्मीं स्वानन्दां स्पन्दलक्षणांम् ॥ १५ ॥ ब्रह्मामृतमयैर्भोगैर्यो यजेत समाहितः । विशुद्धबुद्ध्या देहान्ते स विशत्यमलं पदम् ॥ १६ ॥ अत्र चतुर्णामपि षड्गुणत्वादित्युक्तम् । बलसंवलितेनैव ज्ञानेन ज्ञानपूर्वकमर्चने फलमाह—एवमिति सार्धेन ॥ १५-१६ ॥ तीन मूर्तियों में स्वानन्दा, स्पन्दलक्षणा एवं ब्राह्मी स्थिति स्वयं अनुवृत्ति भेद से विद्यमान ही है अतः साधक ब्रह्मामृतमय भोग से स्थिर चित्त हो इनका यजन करे । ऐसा करने से वह देहान्त होने पर विशुद्ध अमल पद प्राप्त करता है ॥ १५-१६ ॥ अथ मन्त्रचतुष्कं तु ब्रह्मषाड्गुण्यवाचकम् । कर्मिणां मोक्षदं शश्वत् पूर्वोद्दिष्टं निबोधतु ॥ १७ ॥ सुषुप्तिव्यूहचतुष्कं शृण्वित्याह—अथेति ॥ १७ ॥ ब्रह्मषाड्गुण्य के वाचक यह मन्त्र चतुष्क साधक कर्मी को सतत मोक्ष देने वाला है जिसे पूर्व में कह दिया गया है । अब उस मन्त्र को सुनिए ॥ १७ ॥ आदायाक्षगतं बीजं नाभिपूर्वमतः परम् । अरादेकादशात् पूर्वं तस्याधो विनिवेशयेते ॥ १८ ॥ वर्णं नेमेस्तृतीयं यत् तृतीयमिदमक्षरम् । द्वितीयमष्टमाद् वर्णं नाभेस्तुर्यादिनान्वितम् ॥ १९ ॥