सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 441, कुल 480 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशसमुल्लासः ४४१
के मारने में प्रायश्चित्त और अन्य को मारने से बहिश्त मिलेगा ऐसे उपदेश को कुए में डालना चाहिये। ऐसे-ऐसे पुस्तक ऐसे-ऐसे पैग़म्बर ऐसे-ऐसे खुदा और ऐसे-ऐसे मत से सिवाय हानि के लाभ कुछ भी नहीं। ऐसों का न होना अच्छा और ऐसे प्रामादिक मतों से बुद्धिमानों को अलग रह कर वेदोक्त सब बातों को मानना चाहिये क्योंकि उस में असत्य किञ्चिन्मात्र भी नहीं है। और जो मुसलमान को मारे उस को दोज़ख मिले और दूसरे मत वाले कहते हैं कि मुसलमान को मारे तो स्वर्ग मिले। अब कहो इन दोनों मतों में से किस को मानें किस को छोड़ें? किन्तु ऐसे मूढ़ प्रकल्पित मतों को छोड़ कर वेदोक्त मत स्वीकार करने योग्य सब मनुष्यों के लिये है कि जिस में आर्य्य मार्ग अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषों के मार्ग में चलना और दस्यु अर्थात् दुष्टों के मार्ग से अलग रहना लिखा है; सर्वोत्तम है॥६०॥
६१—और शिक्षा प्रकट होने के पीछे जिस ने रसूल से विरोध किया और मुसलमानों से विरुद्ध पक्ष किया; अवश्य हम उनको दोज़ख में भेजेंगे॥ —मं० १। सि० ५। सू० ४। आ० ११५॥
( समीक्षक ) अब देखिये खुदा और रसूल की पक्षपात की बातें! मुहम्मद साहेब आदि समझते थे कि जो खुदा के नाम से ऐसी हम न लिखेंगे तो अपना मज़हब न बढ़ेगा और पदार्थ न मिलेंगे, आनन्द भोग न होगा। इसी से विदित होता है कि वे अपने मतलब करने में पूरे थे और अन्य के प्रयोजन बिगाड़ने में। इस से ये अनाप्त थे। इन की बात का प्रमाण आप्त विद्वानों के सामने कभी नहीं हो सकता॥६१॥
६२—जो अल्लाह फ़रिश्तों किताबों रसूलों और कयामत के साथ कुफ्र करे निश्चय वह गुमराह है॥ निश्चय जो लोग ईमान लाये फिर काफ़िर हुए फिर-फिर ईमान लाये पुनः फिर गये और कुफ्र में अधिक बढ़े। अल्लाह उन को कभी क्षमा न करेगा और न मार्ग दिखलावेगा॥ —मं० १। सि० ५। सू० ४। आ० १३६। १३७॥
( समीक्षक ) क्या अब भी खुदा लाशारीक रह सकता है? क्या लाशारीक कहते जाना और उस के साथ बहुत से शरीक भी मानते जाना यह परस्पर विरुद्ध बात नहीं है? क्या तीन बार क्षमा के पश्चात् खुदा क्षमा नहीं करता? और तीन वार कुफ्र करने पर रास्ता दिखलाता है? वा चौथी बार से आगे नहीं दिखलाता? यदि चार-चार बार भी कुफ्र सब लोग करें तो कुफ्र बहुत ही बढ़ जाये॥६२॥
६३—निश्चय अल्लाह बुरे लोगों और काफ़िरों को जमा करेगा दोज़ख में॥ निश्चय बुरे लोग धोखा देते हैं अल्लाह को और उन को वह धोखा देता है॥ ऐ ईमान वालो! मुसलमानों को छोड़ काफ़िरों को मित्र मत बनाओ॥ —मं० १। सि० ५। सू० ४। आ० १४०। १४२। १४४॥
( समीक्षक ) मुसलमानों के बहिश्त और अन्य लोगों के दोज़ख में जाने का क्या प्रमाण? वाह जी वाह! जो बुरे लोगों के धोखे में आता और अन्य को धोखा देता है ऐसा खुदा हम से अलग रहे किन्तु जो धोखेबाज़ हैं उन से जाकर मेल करे और वे उस से मेल करें। क्योंकि—
“यादृशी शीतलादेवी तादृशः खरवाहनः।”
जैसे को तैसा मिले तभी निर्वाह होता है। जिस का खुदा धोखेबाज़ है उस के उपासक लोग धोखेबाज़ क्यों न हों? क्या दुष्ट मुसलमान हो उस से मित्रता और अन्य श्रेष्ठ मुसलमान भिन्न से शत्रुता करना किसी को उचित हो सकती