भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished480 पृष्ठ

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पृष्ठ 442
४४२सत्यार्थप्रकाशः

है?॥ ६३॥

६४—ऐ लोगो! निश्चय तुम्हारे पास सत्य के साथ खुदा की ओर से पैगम्बर आया। बस तुम उन पर ईमान लाओ॥ अल्लाह माबूद अकेला है॥

—मं० १। सि० ६। सू० ४। आ० १७०। १७१॥

( समीक्षक ) क्या जब पैग़म्बरों पर ईमान लाना लिखा तो ईमान में पैग़म्बर खुदा का शरीक अर्थात् साझी हुआ वा नहीं। जब अल्लाह एकदेशी है, व्यापक नहीं, तभी तो उस के पास से पैग़म्बर आते जाते हैं तो वह ईश्वर भी नहीं हो सकता। कहीं सर्वदेशी लिखते हैं, कहीं एकदेशी। इस से विदित होता है कि कुरान एक का बनाया नहीं किन्तु बहुतों ने बनाया है॥ ६४॥

६५—तुम पर हराम किया गया मुर्दार, लोहू, सूअर का मांस जिस पर अल्लाह के विना कुछ और पढ़ा जावे, गला घोटे, लाठी मारे, ऊपर से गिर पड़े, सींग मारे और दरन्दे का खाया हुआ॥

—मं० २। सि० ६। सू० ५। आ० ३॥

( समीक्षक ) क्या इतने ही पदार्थ हराम हैं? अन्य बहुत से पशु तथा तिर्यक् जीव कीड़ी आदि मुसलमानों को हलाल होंगे? इस वास्ते यह मनुष्यों की कल्पना है; ईश्वर की नहीं। इस से इस का प्रमाण भी नहीं॥ ६५॥

६६—और अल्लाह को अच्छा उधार दो अवश्य मैं तुम्हारी बुराई दूर करूंगा और तुम्हें बहिश्तों में भेजूंगा॥

—मं० २। सि० ६। सू० ५। आ० १२॥

( समीक्षक ) वाह जी! मुसलमानों के खुदा के घर में कुछ भी धन विशेष नहीं रहा होगा। जो विशेष होता तो उधार क्यों मांगता? और उन को क्यों बहकाता कि तुम्हारी बुराई छुड़ा के तुम को स्वर्ग में भेजूंगा? यहां विदित होता है कि खुदा के नाम से मुहम्मद साहेब ने अपना मतलब साधा है॥ ६६॥

६७—जिस को चाहता है क्षमा करता है जिस को चाहे दुःख देता है॥ जो कुछ किसी को भी न दिया वह तुम्हें दिया॥

—मं० २। सि० ६। सू० ५। आ० १८। २०॥

( समीक्षक ) जैसे शैतान जिस को चाहता पापी बनाता वैसे ही मुसलमानों का खुदा भी शैतान का काम करता है! जो ऐसा है तो फिर बहिश्त और दोजख में खुदा जावे क्योंकि वह पाप पुण्य करने वाला हुआ, जीव पराधीन है। जैसी सेना सेनापति के आधीन रक्षा करती और किसी को मारती है, उस की भलाई बुराई सेनापति को होती है; सेना पर नहीं॥ ६७॥

६८—आज्ञा मानो अल्लाह की और आज्ञा मानो रसूल की॥

—मं० २। सि० ७। सू० ५। आ० ९२॥

( समीक्षक ) देखिये! यह बात खुदा के शरीक होने की है। फिर खुदा को 'लाशरीक' मानना व्यर्थ है॥ ६८॥

६९—अल्लाह ने माफ़ किया जो हो चुका और जो कोई फिर करेगा अल्लाह उस से बदला लेगा॥

—मं० २। सि० ७। सू० ५। आ० ९५॥

( समीक्षक ) किये हुए पापों का क्षमा करना जानो पापों को करने की आज्ञा देके बढ़ाना है। पाप क्षमा करने की बात जिस पुस्तक में हो वह न ईश्वर और न किसी विद्वान् का बनाया है किन्तु पापवर्द्धक है। हां ! आगामी पाप छुड़वाने के लिये किसी से प्रार्थना और स्वयं छोड़ने के लिये पुरुषार्थ पश्चात्ताप करना उचित है परन्तु केवल पश्चात्ताप करता रहे, छोड़े नहीं, तो भी कुछ नहीं हो सकता॥ ६९॥

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