सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)
Saundarya Nikhar (Swadeshi Chikitsa)
राजीव दीक्षित द्वारा
स्रोत: Azadi Bachao Andolan First Edition · Azadi Bachao Andolan · 2010 (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 80 में से
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शारीरिक सुन्दरता से कहीं ज्यादा जरूरी है मन और वाणी का सौन्दर्य। बाहरी सुन्दरता तभी तक है जब तक शरीर है, पर मन और वाणी की सुन्दरता चारित्रिक विशेषता है और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर बन जाती है। यही आन्तरिक सौन्दर्य समाज में आपसी सामंजस्य का सबसे बड़ा साधन है। मन और वाणी सुन्दर हों तो न पारिवारिक कलह होंगे, न लड़ाई-झगड़े और न ही दंगे-फ़साद। समाज में आज अगर मार-काट, ठगी-बेईमानी, ईर्ष्या-द्वेष का ही माहौल हर तरफ दिखाई दे रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह मन और वाणी की कुरूपता ही है।
मन के सौन्दर्य का अर्थ यह है कि हमारी भावनाओं में पवित्रता का प्रवाह हो, हम अपने स्वार्थ के लिए किसी का अहित न सोचें और प्राणिमात्र के प्रति हमारी दृष्टि प्रेमपूर्ण हो। वाणी की सुन्दरता यह है कि किसी का दिल दुखाने के लिए कोई बात हम न बोलें। हमारा स्वभाव सत्य बोलने का हो। भाषा इतनी मधुर हो और अपनी बात रखने का ढंग इतना प्यारा हो कि लोग हमारे स्वभाव की प्रशंसा करते न थकें। कल्पना करिए मन और वाणी की यह सौन्दर्य-साधना बचपन से ही सबको कराई जाए तो पूरा समाज ही कितना सुन्दर हो जाए। क्रूरता और हिंसा का तांडव बंद हो जाए और हर तरफ सुख-शांति का साम्राज्य हो।
हालाँकि समाज की वर्तमान दिशा और दशा जैसी है उसमें सभी लोगों का एकदम से चारित्रिक सुधार हो जाना आसान बात नहीं है, फिर भी हम व्यक्तिगत रूप से अपने-अपने स्तर पर यह कोशिश तो शुरू ही कर सकते हैं। अपने-अपने स्तर पर हमारी कोशिशों का असर ही हमारे पास-पड़ोसियों और हमारी संतानों पर भी पड़ेगा। इसी तरह से धीरे-धीरे व्यापक स्तर पर सामाजिक सुधार की नींव पड़ जाएगी। कुछ लोग यह मानते हैं कि जिन लोगों की आदतें एक बार बिगड़ चुकी हैं, वे फिर नहीं सुधर सकते; जिनके मन में ईर्ष्या-द्वेष की आँधी चल रही है, वे नहीं बदल सकते; याकि जिनकी जुबान से कटुता ही टपकती रहती है, वे वाणी का संयम नहीं कर सकते। इसके विपरीत लेखक का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति में आत्मसुधार का भाव पैदा हो जाए तो वह अपने चरित्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। यह बात जरूर है कि कोई भी परिवर्तन सिर्फ इच्छा मात्र से या आनन-फानन में ही नहीं हो जाता। इसके लिए संकल्प और अभ्यास (साधना) अनिवार्य है।
जो लोग ईमानदारी से चाहते हैं कि उनके मन से कुविचारों का झंझावात समाप्त हो जाए शुभ संकल्पों का प्रवाह हो; तथा, उनकी वाणी में मधुरता का वास हो, उनके लिए यहाँ कुछ व्यावहारिक उपाय सुझाए जा रहे हैं। ये उपाय ऐसे हैं, जो सदियों से हमारे पूर्वजों द्वारा आजमाए जाते रहे हैं। वास्तव में भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही चरित्र-सुधार या यूँ कहें कि मनुष्य-निर्माण का एक पूरा सुनियोजित कार्यक्रम ही प्रचलित रहा है और जिसके पालन के संस्कार भी बचपन से ही दिये जाते रहे हैं। इन्हीं संस्कारों के परिणामस्वरूप ही इस देश में अपने स्वार्थों को भुलाकर लोक कल्याण के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे देने वाले लोग घर-घर में ही पैदा होते रहे हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति के प्रवाह में फँसकर अपने जीवन मूल्यों को काफी कुछ भुला बैठे हैं और इसी का नतीजा है कि आज देश में गंभीर चारित्रिक संकट उठ खड़ा हुआ है।
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