भारतकोश
सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)

सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)

Saundarya Nikhar (Swadeshi Chikitsa)

राजीव दीक्षित द्वारा

स्रोत: Azadi Bachao Andolan First Edition · Azadi Bachao Andolan · 2010 (उद्गम)

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 80 में से

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दरअसल प्राचीन भारत में लोगों की दिनचर्या का प्राण था – योगाभ्यास (पतंजलि निर्देशित) और 'पंच महायज्ञ'। पंचमहायज्ञों का पालन करते हुए योगमय जीवन अपनाने का ही परिणाम था कि भारत 'विश्वगुरु' रहा। जिन्हें योग और पंचमहायज्ञ को समग्रता में जानना हो, उन्हें इस विषय के प्राचीन साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। यहाँ सिर्फ़ इतनी सी सामान्य जानकारी अवश्य दी जा सकती है कि ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, बलिवेश्वदेवयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा पितृयज्ञ को मिलाकर हमारे शास्त्रों में पंचमहायज्ञ नाम दिया गया है। इनमें से ब्रह्मयज्ञ का उद्देश्य यह था कि हमें जिस सृष्टि रचयिता ने पैदा किया हम उसके प्रति कृतज्ञ रहें, आत्मविश्लेषण करके अपनी कमियों को दूर करें, आत्मिकशक्ति बढ़ाएँ और स्वाध्याय से ज्ञानवृद्धि करें। देवयज्ञ का विधान इसलिए किया गया था कि इस संसार में रहते हुए हम लोग परस्पर सहयोग का तत्त्व सीखें। वैश्वदेवयज्ञ इसलिए किया जाता था कि मनुष्य के अन्दर से अभिमान की भावना दूर रहे। अतिथियज्ञ का उद्देश्य उपदेशकर्ता से ज्ञान प्राप्ति तथा उसकी सेवा करना था। सबसे अन्तिम पितृयज्ञ का विधान इस

ने हमें पाला-पोसा उनके प्रति हम कृतज्ञता की

भावना रखें तथा उनके अनुभवों से अपनी जीवन-यात्रा के लिए ज़रूरी ज्ञान प्राप्त करें।

वास्तव में कोई भी व्यक्ति इन पंचमहायज्ञों के यथार्थ उद्देश्यों को देखकर समझ सकता है कि ये किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए न होकर मानवमात्र के लिए हैं और किसी भी समाज की बेहतरी के लिए आवश्यक हैं। जिनकी रुचि पंचमहायज्ञों के विधि-विधान के बारे में गहरी समझ बनाने की हो, वे चाहें तो स्वामी समर्पणानन्द द्वारा लिखित 'पंचयज्ञ प्रकाश' नामक पुस्तक पढ़ सकते हैं। यह पुस्तक-समर्पण शोध संस्थान, 4/42 राजेन्द्र नगर, सेक्टर-5, साहिबाबाद, गाजियाबाद (उ.प्र.)-के पते से प्राप्त की जा सकती है।

अब आइए, इस प्राचीन जीवन पद्धति में से हर परिस्थिति के लिए व्यावहारिक कुछ उपायों की चर्चा करें, ताकि जनसामान्य सहजता से इन्हें अपनाकर मन और वाणी के संयम की ओर अपने कदम बढ़ा सकें।

1. यदि अभी तक आपके आहार में तामसिक (मद्य, मांसाहार आदि) चीज़ें शामिल रही हों, तो सबसे पहले इनका सेवन बन्द करिए। यदि आहार सात्विक होगा तो मन और विचारों में भी सात्विकता का प्रवेश आसानी से होगा। आहार के विषय में इस पुस्तक और 'स्वदेशी चिकित्सा-आसान और कारगर नुस्खे' में पर्याप्त जानकारी दी गई है।

2. 6-7 घंटे की पर्याप्त नींद के बाद सबेरे बिस्तर से उठने में यदि आपको आलस्य आता है, तो इस आदत को अविलम्ब त्याग दीजिए। नींद खुलते ही जिसकी असीम कृपा से यह मनुष्य शरीर मिला है, उस परमात्मा को स्मरण करते हुए उठकर बैठ जाइए। दिन भर के ज़रूरी कामों की रूपरेखा बनाइए और ईश्वर को साक्षी मानकर और बिना किसी प्रमाद के उन्हें पूरा करने का संकल्प धारण कीजिए। इतना करने के बाद शौचादि निवृत्ति के लिए जाइए। शौचादि क्रिया के बाद सबेरे स्नान करते हों तो ठीक, अन्यथा हाथ, पैर व मुँह

धोकर मन व विचार की असली सौन्दर्य-साधना के लिए तैयार होइए। इसके लिए आपको बाहर से किसी तरह के अतिरिक्त साधन जुटाने की ज़रूरत बिल्कुल नहीं है। ज़रूरत है तो सिर्फ़ प्रतिदिन नियमित रूप से सबेरे-शाम आधा-आधा घंटा समय देने की। इतना समय न दे सकें

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