शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ ] [ श्रीशारदा तिलक करना चाहिए। सूर्यकान्त आदि मणियों से समुत्पादित की हुई अथवा किसी श्रोत्रिय के गृह में समुत्पन्न अग्नि का पात्र के द्वारा समानयन करके, क्रव्यादाके अंश का परित्याग कर देना चाहिये। आचार्य वीक्षण आदि के द्वारा न्यायानुसार उसका संस्कार करे ।१०-१२। औदर्यबैन्दवाग्निभ्यां भौमस्यैक्यं स्मरन्वसोः । योजयेद्वह्निबीजेन चैतन्यं पावके तदा ।१३। तारेण मन्त्रितं मन्त्री धेनुमुद्रामृतीकृतम् । अस्त्रेण रक्षितं पश्चात्तनुत्रेणावगुण्ठितम् ।१४ अर्चितं त्रिः परिभ्राम्य कुण्डस्योपरि देशिकः । प्रदक्षिणं तदा तारमन्त्रोच्चारणपूर्वकम् ।१५ आत्मनोऽभिमुख वह्नि जानुस्पृष्टमहीतलः । शिवबीजधिया देव्या योनावेव विनिः क्षिपेत् ।१६ पश्चाद्देवस्य देव्याश्च दद्यादाचमनीयकम् । ज्वालयेन्मनुनानेन तमग्निमथ देशिकः ।१७ औदर्य-वैन्दव अग्नियों से भौम वसु की एकता का स्मरण करते हुए तब पावक मे वह्नि वीज के द्वारा चैतन्य को योजित करे ।१३। मन्त्रधारी प्रणव के द्वारा अभिमन्त्रित-धेनु मुद्रा से अमृती कृत — अस्त्र के द्वारा रक्षित और पीछे तनुत्र के द्वारा अवगुण्ठित को आचार्य कुण्ड के ऊपर अर्चि तन्त्री को परिभ्रामित करके तब प्रदक्षिण तारमन्त्र से समु- च्चारण के साथ भूमि तल में घुटनों का स्पर्श करने वाला अपने सामने वह्नि को देवी के शिव बीज की बुद्धि से योनि में ही विनि-क्षिप्त करना चाहिए ।१४-१६। इसके पीछे देवी को और देव को आचमनीय अर्पित करे। देशिकको उसके अनन्तर उस अग्निको ज्वलित करना चाहिए।१७ चित्पिङ्गल' हनदहपचयुग्मान्त्युदीर्य च । सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा मन्त्रोऽय प्रागुदीरितः ।१८