भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पंचम पटल ] [ ६६ अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम् । सुवर्णवर्णममलं समिद्धं विश्वतोमुखम् । १६ उपतिष्ठेत विधिवन्मनुनाऽनेन पावकम् । विन्यसेदात्मनो देहे मन्त्रैर्जिह्वा हविर्भुजः ।२० लिङ्गपायुशिरोवक्त्रघ्राणनेत्रेषु सर्वतः । वह्नीशार्धीशसंयुक्ताः सादियान्ताः सबिन्दवः ।२१ वर्णमन्त्राः समुद्दिष्टा जिह्वानां सप्तदेशिकैः । जिव्हास्तास्त्रिविधाः प्रोक्ता गुणभेदेन कर्मसु ।२२ चित् पिङ्गल और हल-दह-पच इनको दो-दो बार कहे फिर सर्वज्ञा ज्ञापय स्वाहा यह कहे तो पहले कहा हुआ यह मन्त्र होता है । १८। प्रज्वलित अग्नि-जात वेदा-हुताशन-सुवर्ण वर्ण-अमल- समिद्ध विश्वतोमुख की वन्दना करता हूँ । १६। विधि के साथ इस मन्त्र से पावक का उप स्थान करे। अपने शरीर में मन्त्रों के द्वारा हविर्भुक् की जिह्वा का विन्यास करना चाहिए । लिङ्ग-पायु-शिर- मुख घ्राण और नेत्रों में सभी जगह विन्यास करे । वह्नि-रेफ, दूर पकार, अधीश-ऊर्द्धं इनसे संयुक्त सकार से चकार के अन्त तक-ये सभी वर्ण बिन्दु के सहित वर्ण मन्त्र देशिकों के द्वारा सात जिह्वाये समुद्दिष्ट की गई हैं ।२०-२१। गुणों के भेद से कर्मों में वे तीन प्रकार की जिह्वाएं कही गई हैं ।२२। हिरण्या गगना रक्ता कृष्णाऽन्या सुप्रभा मता । --पाऽतिरक्ता च सात्त्विक्यो यागकर्मणि । २३ पद्मरागा सुवर्णाऽन्या तृतीया भद्रलोहिता । लोहितानन्तरं श्वेता धूमिनी च करालिका ।२४ राजस्योरसना वह्नेर्विहिताः काम्यकर्मसु । विश्वमूर्तिस्फुलिङ्गिन्न्यौ धूम्रवर्णा मनोजवा ।२५ लोहितान्या करालाख्या काली तामस्य ईरिताः । एताः सप्त नियुज्यन्ते क्रूरकर्मसु मन्त्रिभिः ।२६