शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचम पटल ] [ १०५ चाहिए। वामभाग में इड़ा नाडी का और दक्षिण भाग में पिङ्गला का और सुषुम्ना को मध्य भागमें ध्यान करके विधिके अनुसार होम करना चाहिए। गुरु स्रुवा द्वारा दक्षिण भाग से घृत का आदान करके जो हृन्मन्त्र के द्वारा अग्नि के दक्षिण लोचन में ‘अग्नये स्वाहा’—इससे करे। उसी भांति वाम भाग से लेकर अग्नि के वाम लोचन में हवन करना चाहिये। हृदय मन्त्र द्वारा इसके अनन्तर ‘सोमाय स्वाहा’ इससे मध्य से घृत को लेकर वह्नि के भाग के नेत्र में होम करे। ५२-५६। फिर ‘अग्नी षोमाभ्यां स्वाहा’—उस हृदय मंत्र के द्वारा स्रुव के दक्षिण भाग से घृत का आदान करके हवन करे। ‘अग्नये स्विष्ट कृते स्वाहा’—इससे सामने होम करना चाहिए। आज्य की आहुति को क्रम से भाग में सम्पात करना चाहिये। ५८। इस प्रकार से गुरु अग्नि के नेत्रों और मुख का उद्घाटन करे। फिर प्रणव के सहित व्याहृतियों के द्वारा हवन करना चाहिए जो कि घृत से दिया जावे। ५६। जुहुयादग्निमन्त्रेण त्रिवारं देशिकोत्तमः। गर्भादिनादिकां वह्नेः क्रियां निर्वर्त्तयेत्क्रमात्। ६० अष्टाभिराज्याहुतिभिः प्रणवेन पृथक् पृथक्। गर्भाधानं पुंसवन सीमन्तोन्नयनं पुनः। ६१ अनन्तरं जात कर्म्म स्यान्नामकरणं तथा। उपनिष्क्रमणं पश्चादन्नप्राशनमीरितम्। ६२ चौलोपनयने भूयोमहानाम्न्यं महाव्रतम्। अथौपनिषदं पश्चाद्गोदानोद्वाहकौ मृतिः। ६३ शुभेषु स्युर्विवाहान्ताः क्रियास्ताः क्रूरकर्मसु। मरणान्ताः समुद्दिष्टा वह्नेरागमवेदिभिः। ६४ देशिक श्रेष्ठ को चाहिए कि अग्नि के मंत्र के द्वारा तीन वार होम करे। क्रम से वह्निकी गर्भाधान आदि क्रिया को पूर्ण करे। ६०। प्रणव के द्वारा आठ आहुतियों से पृथक्-पृथक् गर्भाधान, पुंसवन सीमन्तो- न्नयन, जातकर्म, नामकरण, उपनिष्क्रमण, अन्नप्राशन, चौल,