शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०६ ] [ श्रीशारदा तिलक उपनयन—महानाम्न्य महाव्रत-औपनिषद—गोदान—उव्दाह-मृत्यू है। विवाह के अन्त तक शुभ क्रियाये होती है। वह्नि के आगमों के ज्ञाताओं के व्दारा क्रूरकर्मों में मरणान्त क्रियायें होती हैं। ऐसा कहा गया है ।६२-६४। ततश्च पितरौ तस्न संपूज्यात्मनि योजयेत् । समिधः पञ्च जुहुयान्मूलाग्रघृतसंप्लुलांः ।६५ मन्त्रै जिह्वमूर्तीनां क्रमाद्वहनेर्यथाविधि । प्रत्येकं जुहुयादेकामाहुति मन्त्रवित्तमः ।६६ अवदाय स्रवेणाज्यं चतुः स्रुचि पिधाय ताम्। स्रुवेण तिष्ठन्नेवान्नो देशिको यतमानसः ।६७ जुहुयाद्वहिनमन्त्रेण वौषडन्तेन सम्पदे । विघ्नेश्वरस्य मन्त्रेण जुहुयादाहुतीर्दश ।६८ सामान्य सर्वतन्त्राणामेतदग्निमुखं मतम् । ततः पीठं समभ्यर्च्य देवताया हुताशने ।६६ इसके अनन्तर उसके पितरों का पूजन करके आत्मा में योजित करना चाहिए मूल के अग्रभागों को घृत में संप्लुत करके पाँच समि- धाओं का होम करना चाहिए ।६५। मंत्रों के ज्ञाता को चाहिए कि वाह्निकी जिह्वाङ्ग मूर्त्तियों को क्रम से विधि पूर्वक प्रत्येक के लिए एक आहुति से होम करे ।६३। स्रुव से घृत का अवधान करके उसकी चतुःस्रुक् में विधान करके स्रुव् से आचार्य यतमानस होकर खड़ा होना हुआ ही अग्नि में हवन करे ।६७। जिसके अन्त में वौषट् होवे ऐसे अग्नि के मंत्र को द्वारा सम्पदा को लिए हवन करे । विघ्नेश्वर को मत्र के द्वारा आहुतियां देनी चाहिये ।६८। सभी तन्त्रों का सामान्य यही मुख ताना गया है । हुताशन में देवता की पीठ का अर्चन करना चाहिए ।६६। अर्चयेद्वहिनरूपां ताँ देवतामिष्टदायिनीम् । तन्मुखे जुहुयान्मन्त्री पञ्चविंशतिसंख्यया ।७०