भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पञ्चम पटल ] [ १०७ आज्येन मूलमन्त्रेण वह्नियैकीकरणन्त्विदम् । वह्निदेवतयोरेक्यमात्मना सह भावयेत् ।७१ मूलमन्त्रेण जुहुयादाज्येनैकादशाहुतीः । नाडीसस्थानमुद्दिष्टमेतदागमवेदिभिः ।७२ जुहुयादंगमुख्यानामावृत्तीनामनुक्रमात् । एकैकामाहुति सम्यक सर्पिषा देशिकोत्तमः ।७३ ततोऽन्येऽपि कुण्डेषु संस्कृतेषु यथाविधि । आचार्योविहरेदग्निं पर्वादिषु समाहितः ।७४ त्विजो गन्धपुष्पाद्यै रंगाद्यावरणान्विताम् । तन्त्रोक्तदेवतामिष्ठा पञ्चविंशतिसंख्यया ।७५ भूलेनाज्येनजुहुयुः साज्येन चरुणा तथा । प्रातरुत्थाय जुहुयुः पुनराज्यान्वितैस्तिलैः ।७६ अभीष्ट पदार्थों के देने वाली वह्नि के स्वरूप वाली देवता का मन्त्रधारी के सम्मुख में पच्चीस की संख्या में हवन करना चाहिये ।७०। मूल मन्त्र से आज्य के द्वारा यह वह्नि का एकीकरण होता है । आत्मा के साथ वह्नि और देवता के एक्य की भावना करनी चाहिये ।७१। मूलमन्त्र के द्वारा आज्य से बारह आहुतियां देवे । इसको आगमों के ज्ञाता पुरुषों के द्वारा नाड़ी संस्थान उद्दिष्ट किया गया है ।७२। आकृतियो अनुक्रम से अङ्गमुख्यों को हवन करना चाहिये । देशिकों में उत्तम को चाहिये कि वह भलो-भांति घृत से एक-एक आहुति देवे ।७३। पूर्वादि दिशाओं में समाहित होकर आचार्य फिर अन्य संस्कार किये हुये कुण्डों में विधि के अनुसार अग्नि को विहृत करे ।७४। ऋत्विज गन्ध-पुष्पादि के द्वारा अङ्गादि आवरणों से समन्वित- मन्त्रोक्त देवता का यजन करके पच्चीस संख्या में आज्य के सहित चरु से तथा मूल के द्वारा आज्य से हवन करना चाहिए । पुनः प्रात-काल में उठकर आज्य से संयुत तिलों के द्वारा हवन करे ।७५-७६।