शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ ] [ श्रीशारदा तिलक द्रव्यैर्वा कल्पविहितै सहस्रं साष्टकं पृथक् । ततो सुधौतदन्तास्यं स्नातं शिष्यं समाहितम् ।७७ पाययित्वा पञ्चगव्यं कुण्डस्यान्तिकमानयेत् । विलोक्य दिव्यदृष्ट्या तं तच्चैतन्यं हृदम्बुजात ।७८ गुरुरात्मनि संयोज्य कुर्यादध्वविशोधनम् । उक्तं कलाध्वा तत्त्वाध्वा भुवनाध्वेति च त्रयम् ,७६ वर्णाध्वा च पदाध्वा च मन्त्राध्वेत्यपरं त्रयम् । निवृत्त्याद्याः कलाः पञ्च कलाध्वेति प्रकीर्त्तिताः ।८० तत्त्वाध्वा बहुधाभिन्नः शिवाद्यागमभेदतः । षड्विंशच्छैवतत्त्वानि द्वाविंशद्वैष्णवानि तु ।८१ चतुर्विंशतितत्त्वानि मैत्राणि प्रकृतेः पुनः । तत्त्वानि शैवान्युच्यन्ते शिवशक्तिः सदाशिवः । ईश्वरोविद्यया सार्द्धं पञ्च शुद्धान्यमूनि हि ।८३ अथवा कल्प में विहित द्रव्यों से एक हजार आठ बार पृथक् होम करना चाहिये । इसके अनन्तर भली-भाँति धुले हुए दाँत तथ मुखवाले स्नान किये हुए-समाहित शिष्य को पञ्चगव्य का पान कराकर फिर कुण्ड के समीप में ले आवे । दिव्य दृष्टि से उसका अवलोकन करके उसके चैतन्य के हृदय कमल से गुरु आत्मा में संयोजित करके अध्व का विशोधन करे । ये 'कलाध्वा'—तत्त्वाध्वा' और भुवनाध्वा' तीन बताये गये हैं ।७७-७६। वर्णाध्वा पदाध्वा और मन्त्रध्ववा—वे दूसरे तीन होते हैं । निवृत्ति आद्य पाँच कलायें कलाध्वा इस नाम से कीर्त्तित हुए हैं ।८०। शिवादि आगम के भेद से तत्त्वाध्वा बहुधा भिन्न होता है । छब्बीस शिवतत्व होते हैं और बाईस वैष्णव तत्व होते हैं ।८१। फिर प्रकृतिके मंत्र चोवीस तत्व होते हैं । दशब्रह्म तत्व कहेगये हैं और त्रिप- दात्मा के सात हैं ।८२। अब शिव सम्बन्धित तत्व कहें जाते हैं—शिव- शक्ति सदाशिव, विद्या के साथ ईश्वर ये पाँच शुद्ध हैं ।८.।