भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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११० ] [ श्रीशारदा तिलक ये त्रिपदात्मा के तत्त्व बताये गये हैं। इसकी आगमों के ज्ञाताओं के द्वारा तत्त्वाध्वा ही कहा गया है । ८७-६१। ईरितो भुवनाध्वेति भुवनानि मनीषिभिः । वर्णाध्वेति वदन्त्यर्णान्रादिक्षान्तान्मनीषिणः । ६२ वर्णसंघः पदाध्वा स्यान्मन्त्राध्वा मन्त्रराशयः । क्रमादेतान्पुनः षट् च शोधयेगुरुसत्तमः । ६३ पादान्धुनाभिहृद्भात्तलमूर्द्धस्वपि शिशोः स्मरेत् । यत कूर्चेन विधिवत्तं स्पृशञ्जुहुयाद्गुरुः । ६४ आचार्य कुण्डे संशुद्धैस्तलै राज्यपरिप्लुतैः । शोधयाम्यमुमध्वान स्वाहेति पृथगष्टनः ६५ तारादममाहतीरष्टौ क्रमात्तां विलयं नयेत् । शिवे, शिवान्तान्सँलीनाञ्जनये त्मृष्टिमार्गतः । ६६ मनीषियों के द्वारा भुवनों को ही भुवनाध्वा कहा गया है । मनी- षीगण आदि से लेकर क्षकार पर्यन्त रहने वाले वर्णोंको वर्णाध्वा बोलते हैं । ६२। वर्णों का संघ ही पदाध्वा होता है और मन्त्रों की राशियाँ ही मन्त्राध्वा हैं । श्रेष्ठ गुरु को चाहिए कि क्रम से वह इन छहों का शोधन करे । ६३। शिशु के पाद, अन्धु, नाभि, हृदय, भाल और मूर्धा में भी स्मरण करे । फिर कूर्च से विधि के सहित गुरु उसका स्पर्श करते हुये हवन करे । ६४। आचार्य कुण्ड में शुद्ध आज्य क परिप्लुत तिलों से 'अमु' अध्वानं शोधयामि स्वाहा' इससे अध्वा के पृथक् प्रणव के आदि द्वारा आठ आहुतियाँ देवे और क्रमसे उसको विलयको प्राप्त कर देवे । शिव में संलीन शिवान्तों का सृष्टि मार्ग से जनन करना चाहिए । ६५-६६। विलोक्यन्दिव्यदृष्टया तं शिशुं देशिकोत्तमः । आत्मस्थितं तच्चैतन्यं पुनः शिष्ये नियोजयेत् । ६७ स्रुचा पूर्णाहुतिं दत्वा मूलमन्त्रेण देशिकः । उद्वास्य देवतां कुम्भे साङ्गां सावरणां गुरुः । ६८