भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पंचम पटल ] i १११ पुनर्व्याहृतिभिस्त्वत्रा जिह्वादीनां विभावसोः । एकैकां महतिं दत्वा परिषिञ्चाद्द्भिरात्मनि ।६६ पावकं योजयित्वा स्वे परिधीन्सपर स्तरान् । नैमित्तिके दहेन्मन्त्री नित्यो तु न दहेदिमाम् । १०० नेत्रे शिष्यस्य वध्नीयान्नेत्रमन्त्रेण वाससा । करे गृहीत्वा तं शिष्यं कुण्डतो मण्डलं नयेत् । १०१ तस्याञ्जलिं पुनः पुष्पैः पूरयित्वा यथाविधि । कलशे देवताप्रीत्यै क्षेपयेन्मूलमुच्चरन् ।१०२ देशिकों में परम श्रेष्ठ को चाहिए कि उस शिलु को दिव्य दृष्टि के द्वारा विलोकन करते हुए आत्मा में स्थित उस चैतन्य को फिर शिष्य रूप में नियोजित करे ।६०। स्रुवासे पूर्णाहुति देकर देशिक (आचार्य) मूल मंत्र के द्वारा गुरु अङ्गों के सहित तथा आवरणों से समन्वित देवता भी कुम्भ में उद्वासित कर ओर व्याहृतियों के द्वारा होम करे जो कि विश्र वसु की जिह्वादिक का है। एक-एक आहुति देकर आत्मा में जल से परिषिञ्चन करना चाहिए ।६८-६६। अपने में पावक को योजित करके सपरिस्तर परिधियों का मंत्रधारी नैमित्तिक में दहन करे। और नित्य कर्म में इसका दहन न करना चाहिए ।१००। नेत्र मंत्र से वस्त्र के द्वारा शिष्य के नेत्रों को बांध देवे। उस शिष्य को कर में ग्रहण करके कुन्ड से मण्डल में ले जाना चाहिए । १०१। विधि के अनुसार उसकी अंजलि को पुष्पों से भर देव और कलश में देवता की प्रीति के लिए मूल मन्त्र को उच्चारण करते हुए क्षेपण करना चाहिए ।१०२। व्यपोह्य तं नेत्रबन्धमासीनं दर्भसंस्तरे । आत्मयागक्रमाद्भूयः सङ्कृत्योत्पाद्य देशिकः । १०३ तत्तन्मन्त्रोदितान् न्यासान्कुर्याद्देहे शिशोस्तदा । पंचोपचारैः कुम्भस्थां पूजयित्वेष्टदेवताम् । १०४ तस्यां तन्त्रोक्तमार्गेण विदध्यात्सकलीकृतिम् । मण्डलेऽलङ्कृते शिष्यमन्यस्मिन्नुपवेशयेत् ।१०५