शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ ] [ श्रीशारदा तिलक नदत्सु पञ्चवाद्येषु सार्द्धं विप्राशिषा गुरुः। विधिवत्कुम्भमुद्धृत्य तन्मुखस्थान्सुरद्रुमान् ।१०६ शिशो शिरसि विन्यस्य मातृकां मनसा जपन्। मूलेन साधितेस्तोयैरभिषिञ्चेत्तामात्मवित् ।१०७ फिर उस वस्त्र द्वारा नेत्रों के बन्धन को दूर हटाकर दर्भों के संस्त- रण पर बैठे हुए शिष्य को फिर आत्म याग के क्रम से देशिक संहार करके तथा उत्पादन करके उन-उन मन्त्रोंसे उदित न्यासों को उस समय में शिशु के देह में करना चाहिए। पाँच उपचाओं के द्वारा कुम्भ में संस्थित इष्ट देवता का पूजन करके उसमें फिर तन्त्र शास्त्र में कथित मार्ग द्वारा सकलों कृति को करना चाहिए । अन्य समलंकृत मण्डल में शिष्य की उपदिष्ट करा देवे ।१०३-१०५। पाँच वाद्यों के बजाये जाने पर विप्रों के आशीर्वाद के साथ गुरु विधि पूर्वक कुम्भ को उठाकर उसके मुख में स्थित सुरद्रुमों को शिशु के लिए में विन्यप्त करके मातृ- काओं का मन द्वारा जप करता हुआ आत्म वेत्ता मूल मन्त्र के द्वारा साधित जल से उनका अभिषिचन करे ।१०६-१०७। पूजितां पुनराय वर्धनीमस्त्ररूपिणीम् । तस्यां सुसाधितैस्तोयैः सिञ्चेद्रक्षार्थमञ्जसा ।१०८ अविशिष्टेन तोयेन शिष्यमाचामयेद्गुरुः । ततस्तं सकलीकुर्याद्देवतात्माऽऽत्मवित् ।१०६ उत्थाय शिष्यो विमले वाससी परिधाय च । आचम्य वाग्यतो भूत्वा निषीदेत्सन्निधौ गुरोः ।११० देवतामात्मनाः शिष्ये संक्रान्तां देशिकोत्तमः । पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यै रैक्यं सम्भावयंस्तयोः ।१११ दद्याद्विद्यां ततस्तस्मै विनीतायाम्बुपूर्वकम् । गुरोर्लब्धां पुनर्विद्यामष्टकृत्वो जपेत्सुधीः ।११२ गुरुविद्यादेवतानामैक्यं सम्भावयन्धिया । प्रणमेद्दण्डवद्भूभौगुरुं तं देवतात्मकम् ।११३