शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम पटल } [ २११ य पादाम्बुजद्वन्द्वं निजमूर्द्धनि योजयेत् । शरीरमर्थं प्राणं च (णांश्च) सर्वं तस्मै निवेदयेत् ।११४ फिर पूजित अस्त्र रूप वाली वर्धनी का आदान करके तुरन्त ही उसमें सुसाधित जलों द्वारा रक्षा के लिए सिंचन करना चाहिए ।१०८। गुरु बचे हुए जल के द्वारा शिष्य को आचमन करावे । इसके उपरान्त आत्मवेत्ता देवता की आत्मा का सकलीकरण करे ।१०६। फिर शिष्य उठकर वस्त्रों का परिधान करे-आचमन करके मौनी कहकर गुरुदेव की सन्निधि से निष्षण हो जावे ।११०। देशिक वर शिष्य में आत्मा के सङ्क्रान्त देवता का गन्ध पुष्पादिक के द्वारा अर्चन करे और उन दोनों की एकता की भली भांति भावना करनी चाहिए ।१११। अस्त्रपूर्वक विनीत उस शिष्य के लिए विद्या देवे । गुरु से प्राप्त हुई विद्याको सुधी आठ बार जप करे ।११२। बुद्धिके द्वारा गुरु-विद्या और देवताकी एकता की भावना करते हुए उस देवता के स्वरूप वाले गुरु को भूमि में पढ़- कर दण्डे की भाँति होते हुए प्रणाम करना चाहिए अर्थात् साष्टाङ्ग प्रणाम करे ।११३। शिष्य गुरु के दोनों चरण कमलों को अपने मस्तक पर योजित करे, शरीर, अर्थ और प्राण सभी कुछ उस गुरु के लिये निवेदन कर देवे ।११४। ततः प्रभृति कुर्वीत गुरोः प्रियमनन्यधीः । ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दत्त्वा समग्रां प्रीतमानसः ।११५ ब्राह्मणांस्तर्पयेत्पश्चाद्भक्ष्यभोज्यैः सदक्षिणैः । एषा क्रियावती दीक्षा प्रोक्ता सर्वसमृद्धिदा ।११६ अथ वर्णात्मिकां वक्ष्ये दीक्षामागमचोदिताम् । पुम्प्रकृत्यात्मका वर्णाः शरीरमपि तादृशम् ।११७ यतस्तस्मात्तनी न्यस्ये द्वर्णान् शिष्यस्य देशिकः । तत्तत्स्थानगतांस्वर्णान्प्रतिलोमेन संहरेत् ।११८ स्वाज्ञया देवताभावाद्विधिना देशिकोत्तमः । तदा विलीमतत्त्वोऽयं शिष्योदिव्यतनुर्भवेत् ।११६