भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 511 में से

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११६ । [ श्रीशारदा तिलक मयी दीक्षा के विषय में बतलाया जायगा । शिशु के शरीर के मध्य में चार दलों वाले मूलाधार में विमल तथा तीन तेजों से विजृम्भित त्रिकोण के मध्य में तीन वलय से संयुक्त विद्युत के करोड़ों की संख्या के समान प्रभा वाली ।११९। चेतना मात्र विग्रह वाली शिव शक्ति मयी देवी है जो सूक्ष्म-सूक्ष्मान्तर है। शक्तिका भेदन करके तुरन्त ही मध्य मार्ग से षट् चक्र में गमन कर रही है। जो पर शिवावधि दिव्या है। वकार से आदि लेकर सकार के अन्त तक दलों में स्थित वर्णों का कमलासन में संहार करना चाहिए। ३०-१३१। तं षट् पत्रमय पदमे वादिलान्ताक्षरान्विते । स्वाधिष्ठाने समायोज्य वेधयेदाज्ञया गुरुः ।१३२ तान्वर्णांन्संहरेद्विष्णौ तं पुननीभिपङ्कजे । दशपत्रे डादिफान्तवर्णढ्ये योजयेद्गुरुः ।१३३ यान्वर्णान्संहरेद्रुद्रे तं पुनहृ दयाम्बुजे । कादिठान्तार्क पत्राढ्ये योजयित्त्वेश्वरे गुरुः ।१३४ तान्वर्णांन्संहरेदस्मिस्तं भूयः कण्ठपङ्कजे । स्वराढ्ये षोडशदले योजयित्वा स्वरान्पुनः ।१३५ सदाशिवे तान्संहृत्य तं पुनर्भू सरोरुहे । द्विपत्रे हक्षलसिते योजायित्वा ततो गुरुः ।१३६ तद्वर्णी सहरेद्विन्दौ कलायां तं नियोजयेत् । तां नाडेऽन्तर नादं नादान्ते योजयेद्गुरुः ।१३७ उसको वकार के आदिसे लेकर लकारके अन्त तक अक्षरों से समा- न्वित-षट्पत्रोंसे परिपूर्ण पद्ममें अपने अधिष्ठान में संयोजित करके गुरु आज्ञा से वेधन करे ।१३२। उन वर्णों का संहार करे और विष्णु के नाभिपंकज में जो दश पत्रों से अन्वित और डकार से लेकर फकार के अन्त तक युक्त है, गुरु योजित करे ।१३३। उन वर्णों को रुद्र में संहृत करे फिर उसको क से अ दि डकार के अन्त तक अर्क पत्र से आढ्य अर्थात् द्वादश दलों से युक्त हृदय कमल में ईश्वर में योजित करे ।१३४।

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