शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचम पटल ] [ ११७ गुरु उन वर्णों की इस में संहार करे। फिर उसको कण्ठ पंकज में जो स्वरोंसे अन्वित और सोलह दलों वाला है योजित करके फिर स्वरों को उनको सदाशिव में संहार करके उसको पुनः भ्रूसरोरुह में, जो दो पत्रों वाला है और हक्ष से लसित हो उसमें योजित करके फिर गुरु उन वर्णों को बिन्दु से संहार करे और उसको कला में नियोजित करना चाहिए। उसको नाद में और इसके अनन्तर नाद को नादान्त में गुरु योजित करे । १३५-१३७। तमुन्मुन्यां समायोज्य विधु (ष्णु) वक्त्रान्तरे च ताम् । तां पुनर्गुरुवक्त्रे तु योजयेद्देशिकोत्तमः ।१३८ सहैवात्मना शक्तिं वेधयेत्परमेश्वरे । गुर्वाज्ञया छिन्नपाशस्तदा शिष्यः पतेद्भुवि ।१३६ संजातदिव्यबोधोऽसौ सर्वं विदन्ति तत्क्षणात् । साक्षाच्छिवोभवत्येष नात्र कार्य विचारणा ।१४० एषा वेधमयी दीक्षा (१) सर्वसंवित्प्रदायिनी । क्रमाच्चतुर्विधा दीक्षा तत्रोऽस्मिन्संख्यगीरिता ।१४१ अथात्र होमद्रव्याणां प्रमाणमभिधीयते । कर्षमात्रं घृतं होमे शुक्तिमात्रं पय स्मृतम् ।१४२ उन्मनी में समायोजित करके और उसको विष्णु के मुख के अन्दर और फिर गुरु के मुख में उसको देशिक योजित करे ।१३८। इस तरह से आत्मा के सहित ही शक्ति का परमेश्वर में वेधन करना चाहिए । गुरु की आज्ञा से उस समय में पाशों का छेदन कर देने वाला शिष्य भूमि में पतन करे ।१३६। इसको दिव्य वोध उत्पन्न हो जाता है और यह उसी क्षण में सब कुछ प्राप्ति कर लिया करता है। यह फिर साक्षात् शिव हो जाता है-इसमें कुछ भी विचारणा नहीं है । अर्थात् लेश मात्र भी संशय नहीं है ।१४०। यह वेधमयी दीक्षा होती है जो सम्पूर्ण संवित् के प्रदान करने वाली है । क्रम से चार प्रकार की दीक्षा इस तन्त्र में भली भाँति बतला दी गयी है ।१४१। उसी वहाँ पर