भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पंचम पटल ] [ ११६ फलान्यन्या (न्येता) निःखण्डानि समिधः स्युर्दशांगुलाः । दूर्वात्रयं समुद्दिष्टं गुडूची चतुरंगुला ॥ १४६ ब्रीहयो मुष्टिमात्राः स्युर्मुग्दमाषयवा अपि । तण्डुलाः स्युस्तदर्द्धांशाः, कोद्रवा मुष्टिसंमिताः । १५० गोधूमरक्तकमला विहिता मुष्टिमानतः । तिलाश्चुलुकमात्राः स्युः सर्षपास्तत्प्रमाणकाः ॥१५१ शुक्तिप्रमाणं लवणं मरीचान्येकविंशतिः । पुर्वदरमानः स्याद्रामठं तत्समं स्मृतम् ।१५२ बिल्व के फल का तथा कपित्थ का फल का तीसरा खण्ड होना चाहिए। होम में उर्वारुक फल का भी तीसरा खन्ड बतलाया गया है। ।१४८। अन्य फलों के भी खन्ड ही ग्रहण करने चाहिए और समिधायें दश अंगुल के प्रमाण वाली होनी चाहिए। दूर्वा तीन बताई गई है ओर गुडूची (गिलोय) चार अंगुल परिमाण की होती है।१४६। ब्रीहि एक मुट्ठी भर होवे । मूंग और माष भी ऐसे ही होवे । उसके आधे अंश वाले सण्डुल होवे और को द्रवभी एक मुट्ठीभर होने चाहिए । १५०। गोधूम (गेहूँ) तथा रक्त कमल मुष्टि मात्र ही विहित किये गये हैं। तिल एक चुल्लू भर होवे और इसी परिमाण वाले सरसों के दाने होने चाहिए ।१५१। एक शुक्ति के परिमाण वाला लवण होवे ओर इक्कीस मिर्च होनी चाहिए, बदर के मान वाला गुरु तथा रामठ भी उसी के समान होवे । ऐसा कहा गया है ।१५२। चन्दनागुरु-कर्पूर-कस्तूरी-कुङ्कुमानि च । तिन्तिडाबीजमानानि समुद्दिष्टानि देशिकैः ।१५३ वैश्वानरं स्थितं ध्यायेत्समिद्धोमेषु देशिकः । शयानमाज्यहोमेषु निष्षण्णं शेषवस्तुषु ।१५४ सधूमोऽग्निःशिरो ज्ञेयं निर्धूमेश्चक्षुरेवहि । ज्वलत् कृष्णो भवेत्कर्णः काष्ठमग्रे मनस्तथा । १५५