शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचम पटल ] [ १२१ भेरी-मेघ और गजेन्द्र की-सी शुभ का आवाहन करने वाली हुआ करती है । नाग, चम्पा, पाटल और यूथिका के तुल्य, पदूम, इन्दीवर, कल्हार, घृत, गूगल के सदृश, पावक का गन्ध शुभ देने वाला होता है, ऐसा तन्त्र के ज्ञाताओं के द्वारा कहा गया है ।१५६-१६०। दक्षिण की ओर जाने वाली, कम्प से रहित, छत्र की आभा वाली अग्नि की शिखा होतो है । यह यजमान को शुभ देने वाली है और विशेष रूप से राज्य का भी शुभ करने वाली होती है ।१६१। कुन्द और इन्दु के समान धवल वह्नि का धूम का आवाहन करने वाला कहा गया है । कृष्ण में गत कृष्ण वर्ण यजमान का विनाश करता है ।१६२। श्वेतोराष्ट्रं निहन्त्याशु वायसस्वरसन्निभः । खरस्वरसमोवह्नेर्ध्वनिः सर्वविनाशकृत् ।१६३ पूतिगन्धोहुतभुजोहोतुः खप्रदोभवेत् । छिन्नावतां शिखा कुर्यान्मृत्युं धनपरिक्षयम् ।१६४ शुकपक्षनिभो धूमः पारावतसमप्रभः । हानिं तुरगजासीनां गवां च कुरुतेऽचिरात् ।१६५ एवं विधेषु दोषेषु प्रायश्चित्ताय देशिकः । भूतेनाज्येन जुहुयात्पञ्चविंशति माहुतीः ।१६६ श्वेत वर्ण वाला धूम शीघ्र ही राष्ट्र का निहनन किया करता वायस के स्वर के समान और खर के स्वर के तुल्य ध्वनि सबका विनाश करने वाली हुआ करती है ।१६३। पूति गन्ध अग्नि का होता को दुःखप्रद होता है और अग्नि की छिन्नावर्त शिखा मृत्यु और धन का परिक्षय किया करती है ।१६४। शुक के पंख या कबूतर का सा धूम अशुभ होता है । ऐसा धूम अश्व और गज आदि की हानि तथा गौओं को हानि अविलम्ब ही किया करता है।१६५। इस प्रकार के होने पर आचार्य प्रायश्चित करता है, जिसके लिए उसको मूल मन्त्र के द्वारा घृत से पच्चीस आहुतियां देनी चाहिए ।१६६।