शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पंचम पटल ] [ १२१ भेरी-मेघ और गजेन्द्र की-सी शुभ का आवाहन करने वाली हुआ करती है । नाग, चम्पा, पाटल और यूथिका के तुल्य, पदूम, इन्दीवर, कल्हार, घृत, गूगल के सदृश, पावक का गन्ध शुभ देने वाला होता है, ऐसा तन्त्र के ज्ञाताओं के द्वारा कहा गया है ।१५६-१६०। दक्षिण की ओर जाने वाली, कम्प से रहित, छत्र की आभा वाली अग्नि की शिखा होतो है । यह यजमान को शुभ देने वाली है और विशेष रूप से राज्य का भी शुभ करने वाली होती है ।१६१। कुन्द और इन्दु के समान धवल वह्नि का धूम का आवाहन करने वाला कहा गया है । कृष्ण में गत कृष्ण वर्ण यजमान का विनाश करता है ।१६२। श्वेतोराष्ट्रं निहन्त्याशु वायसस्वरसन्निभः । खरस्वरसमोवह्नेर्ध्वनिः सर्वविनाशकृत् ।१६३ पूतिगन्धोहुतभुजोहोतुः खप्रदोभवेत् । छिन्नावतां शिखा कुर्यान्मृत्युं धनपरिक्षयम् ।१६४ शुकपक्षनिभो धूमः पारावतसमप्रभः । हानिं तुरगजासीनां गवां च कुरुतेऽचिरात् ।१६५ एवं विधेषु दोषेषु प्रायश्चित्ताय देशिकः । भूतेनाज्येन जुहुयात्पञ्चविंशति माहुतीः ।१६६ श्वेत वर्ण वाला धूम शीघ्र ही राष्ट्र का निहनन किया करता वायस के स्वर के समान और खर के स्वर के तुल्य ध्वनि सबका विनाश करने वाली हुआ करती है ।१६३। पूति गन्ध अग्नि का होता को दुःखप्रद होता है और अग्नि की छिन्नावर्त शिखा मृत्यु और धन का परिक्षय किया करती है ।१६४। शुक के पंख या कबूतर का सा धूम अशुभ होता है । ऐसा धूम अश्व और गज आदि की हानि तथा गौओं को हानि अविलम्ब ही किया करता है।१६५। इस प्रकार के होने पर आचार्य प्रायश्चित करता है, जिसके लिए उसको मूल मन्त्र के द्वारा घृत से पच्चीस आहुतियां देनी चाहिए ।१६६।
१२२ ] [ श्री शारदा तिलक षष्ठ पटल अथ वर्णतनुं वक्ष्ये विश्वबोधविधायिनीम् । यस्यानुपलब्धायां सर्वमेतज्जगज्जडम् ।१ ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टो गायत्रं छन्द ईरितम् । सरस्वती समाख्याता देवता देशिकोत्तमैः ।२ अक्लीवह्रस्वदीर्घान्तैर्नतैः षड्वर्गकैः क्रमात् । षडङ्गानि विधेयानि देशिकैर्जातिसंगुतम् ।३ पञ्चाशल्लिपिभिर्विमुक्तमुखदन्तो पन्मध्यवक्षःस्थलां भास्वन्मौलिनिवद्धचन्द्रशकलात्तो नतुङ्गस्तनीम् । मुद्रामक्षगुणं सुधाढयकलशं विद्यां च हस्ताम्बुजैः बिभ्राणां विशदप्रभां त्रिनयनाँ वाग्देवतामाश्रये ।४ ललाटमुखवृत्ताक्षिश्रुतिघ्राणेषु गण्डयोः । ओष्ठदन्तोत्तमाङ्गास्ये दोःपत्सन्ध्वग्रकेषुच ।५ पार्श्वयोः पृष्ठतो नाभौ जठरे हृदयेऽसके । ककुद्यं से च हृत् पूर्व पाणिपाद्युगे तथा ।६ जठराननयोन्यंस्त्येन्मातृ कार्णान्यथाक्रमात् । त्वगसृङ् मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रमकान्विदुः ।७ इसके अनन्तर वर्ण तनु अर्थात् मातृका का वर्णन करूँगा जो विश्व के बोध की कराने वाली होती है जिसके उपलब्ध न होने पर यह सम्पूर्ण जगत् जड़ होता है ।१। उत्तम आचार्यों ने इसका ऋषि ब्रह्मा- गायत्र छन्द कहा है । और सरस्वती देवी इसकी देवता कही गई है । ।२। आचार्यों को आक्लीव, ह्रस्व, दीर्घ अन्त वाले षड् वर्गों के द्वारा क्रम से जाति संयुत षट् अङ्ग करने चाहिए ।३। पचास लिपियों से विमुक्त मुख-दाँत और मध्य में वक्षः स्थल वाली, जो मस्तकमें बाँधे हुए देदीप्यमान चन्द्र की कला से संयुत है, जिसके कुच युग स्थूल और
षष्ठ पटल ] [ १२३ समुच्चय हैं, जिसके करकमलों में मुद्रा, अक्षमाला, सुधा से परिपूर्ण दो कलश और विद्या धारण किये हुए हैं, विशद प्रभा को धारण करती हुई और तीन नयनों से समन्वित वाग्देवता का मैं समाश्रय ग्रहण करता हूँ ।४। मातृका के वर्णों का क्रम से ललाट मुख, वृत्त, नेत्र, कान, नासिका, दोनों कपोल, ओष्ठ, दाँत, मस्तक, मुख, संधियों का अग्रभाग, दोनों पार्श्व, पृष्ठ-नाभि, उदर, हृदय, कन्धा, ककुद्यंस, हृत्पूर्ण, दोनों हाथ, दोनों चरण, जठर और आनन में न्यास करना चाहिए। तथा त्वचा, रुधिर, मांस मेद, अस्थि, शुक्र के स्वरूप वालों में भी न्यास करे ।५-७। वादिहान्तान् न्यसेदात्मपरमज्ञानपूर्वकान् । दीक्षितः प्रोक्तमार्गेण न्यसेल्लक्ष समाहितः ।८ जपेत्तत्संख्यया विद्वानयुतं मधुराप्लुतैः । विदधीत तिलैर्होमं मातृकामन्वहं जपेत् ।९ व्योमेन्द्वौरसनार्णं कर्णिकमर्चां द्वन्द्वैः स्फुरत्केसर पत्रान्तर्गतपञ्चवर्ग यशलार्णादित्रिवर्ग क्रमात् । आशास्वस्रिषु लान्तलाङ्गलियुजा त्रोणापुरेणावृतं पद्मं कल्पितमन्त्र पूजयतु तां वर्णात्मिकां देवताम् ।१० आधारशक्तिमारभ्य पीठशक्त्यन्तमर्चयेत् । मेधा प्रज्ञा विद्या श्रीर्वृतिस्मृतिबुद्धयः ।११ विद्येश्वरीति सम्प्रोक्ता भारत्या नव शक्तयः । वर्णाब्जेनासनं दद्यान्मतिम्मलेन कल्पयेत् ।१२ आवाह्य पूजयेत्तस्यां देवीमावरणैः सह । अङ्गैरावरणं पूर्वं द्वितीयं युग्मशः स्वरैः ।१३ अष्टवर्गैस्तृतीयं स्यात्तच्छक्तिभिरनन्तरम् । पञ्चमं मातृभिः प्रोक्तं षष्ठं लोकेश्वरैः स्मृतम् ।१४ लकार से आदि हकार के अन्त तक आत्म परम ज्ञान पूर्वकों का दीक्षित व्यक्ति न्यास करे । और परम समाहित होकर एक लाख जप
१२४ ] [ श्रीशारदा तिलक करना चाहिए। जाप की संख्या से विद्वान् को दश सहस्र मधुर से आप्लुत तिलों के द्वारा होम करे और मातृका का प्रतिदिन जप करना चाहिये ।८-६। व्योम, हकार, इन्दु, क्षःओ, स्वरूप, रसनार्ण, विसर्ग, से युक्त कर्णिका से संयुत स्वरों के द्वन्द्वों के स्फुरित केसरों से समन्वित, पत्रों में अन्दर रहने वाले पाँच कादि वर्ग और यझल आदि त्रिवर्ण को क्रम से दिशाओं में लान्त लाङ्गलि से युक्त भूपुर से समावृत एक पद्म की कल्पना करे और उस वर्णों के स्वरूप वाले देवता का पूजन करना चाहिये ।१०। आधार शक्ति से आरम्भ करके पीठ शक्ति के अवसाम पर्यन्त अभ्यर्चन करना चाहिए । मेधा, प्रज्ञा, प्रभा, विद्या, श्री, धृति, स्मृति, बुद्ध, विद्येश्वरी ये भारती की नौ शक्तियां कही गई हैं। वर्णाब्ज से आसन अर्पित करे और मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करनी चाहिए ।११-१२। उसमें देवी का आवाहन करके फिर आवरणों के सहित देवी का अर्चन करे । पूर्व आवरण अङ्गो के द्वारा होता है और दूसरा दो-दो स्वरों के द्वारा हुआ करता है ।१३। आठ वर्गों से तीसरा आवरण होता है और शक्तियों के द्वारा चौथा आवरण हुआ करता है । पाँचवां आवरण मातृकाओं से होता है और छठवाँ लोकेश्वरों के द्वारा हुआ करता है ।१४। लोकपालायुधैः प्रोक्तं वज्राद्यैः सप्तमं ततः । विधिनानेन वर्णेशीमुपचारैः प्रपूजयेत् ।१५ व्यापिनी लापिनी पश्चात्पाविनी क्लेदिनी तथा । धारिणी मालिनी भूयो हसिनी शङ्खिनी स्मृता ॥१६ शुभ्राः पत्रेषु सम्पूज्या धृताक्षगुणपुस्तकाः । ब्राह्मी माहेश्वरी भूयः कौमारी वैष्णवी मता ।१७ वाराह्यनन्तरेन्द्राणी चामुण्डा सप्तमी मता । अष्टमी स्यान्महालक्ष्मीः प्रोक्तास्यु विश्वमातरः ।१८ दण्डं कमण्डलुं पश्चादक्षसूत्रमथाभयम् । विभ्रती कनकच्छाया ब्राह्मी कृष्णाजिनोज्ज्वला ।१६
षष्ठ पटय ] [ १२५ शूलं परश्वधं क्षुद्रं दुन्दुभिं नृकरोटिकाम् । वहन्तो हिमशङ्काशा ध्येया माहेश्वरी शुभा ।२० अङ्कुशं दण्डखट्वाङ्गौ पाशं च दधती करैः । बन्धूकपुष्पसङ्काशा कौमारी कामदायिनी ।२१ वज्र रादि लोकपालों के आयुधों के द्वारा सातवाँ आवरण कहा गया है। इसी विधि से उपचारों के द्वारा वर्णेशी का पूजन करना चाहिए । १५ । व्यापिनी, नागिनी, पाविनी, क्लेदिनी, धारिणी मालिनी, हंसिनी, शंखिनी बताई गई हैं। १६। इन परम शुभ्रों का जो अक्षों की माला और पुस्तक को धारण किये हैं पत्रों में पूजनी चाहिए । फिर ब्राह्मी, महेश्वरी कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और सातवीं चामुण्डा मानी गई हैं ।१७। आठवी महालक्ष्मी है, ये विश्व की माताएं कही गई हैं ।१८। अब इनका स्वरूप बतलाया जाता है। ब्राह्मी सुवर्ण की कान्ति से युक्त है और कृष्ण अजिन से समुज्ज्वला है। यह अपने करकमलों के द्वारा दन्ड, कमण्डलु, अक्ष माला और अभयदान को धारण करने वाली है ।१६। परम शुभ माहे श्वरी का फिर ध्यान करना चाहिए जो शूल, परशु, वधा क्षु दुन्दुभि, नृकरोटिका को धारण करती हुई है और हिम के समान स्वरू- वाली हैं । २० । कौमारी कामनाओं के प्रदान करने वाली है और बन्धूक के पुष्प के सदृश वर्ण वाली हैं। यह अपने करों में अंकुश, खट्वाङ्ग, दन्ड और पाश को धारण करने वाली है ।२१। चक्रं घण्टां कपालं च शंख च दधता करैः । तमालश्यामला ध्येया वैष्णवी विभ्र्मोज्ज्वला ।२२ मुशलं करवालं च खेटकं दधती हलम् । करैश्चतुर्भिर्वाराही ध्येया कालघनच्छविः ।२३ अंकुशं तोमरं विद्युत्कुलिशं विभ्रती करैः । इन्द्रनीलनिभेन्द्राणी ध्येया सर्वसमृद्धिदा ।२४
१२६ ] [ श्रीशारदा तिलक शूलं कृपाणं नृशिर कपालं दधती करः । मुण्डस्रङ् मण्डिता ध्येया चामुण्डा रक्तविग्रहा । २५ अक्षस्रजं बीजकपूरं कपालं पंकजं करै । वहन्ती हेमसंङ्काशा महालक्ष्मीः समीरिता । २६ वैष्णवी तमाल के समान श्यामल वर्ण से सयुत है और विभ्रमों के द्वारा परम उज्ज्वल हैं ऐसे ही स्वरूप वाली का ध्यान करना चाहिए । वह चक्र-घण्टा-कपाल और शंख को कर कमलों में धारण करने वाली है ।२२। वाराही काले मेघ के तुल्य छवि वाली है-ऐसा ही ध्यान करे । यह अपने चार कर कमलों द्वारा मुशलकर बाल-खेटक और हल को धारण करने वाली है ।२३। इन्द्रनील मणि के सदृश समस्त समृद्धियों के प्रदान करने वाली इन्द्राणी का ध्यान करना चाहिए जो करों में अंकुश, तोमर, विद्युत और कुलिश को धारण करने वाली है ।२४। रक्त शरीर वाली और मुण्डस्रक् से मन्डित चामुन्डा देवी का ध्यान करना चाहिए, जो शूल, कृपाण, नरमुन्ड, और कपालको करों में धारण करने वाली है । महालक्ष्मी का स्वरूप सुवर्ण के सदृश बताया गया है जो अपने कर-कमलोंमें अक्षमाला, बीजपूर-कपाल और पंकज को धारण करने वाली है ।२५-२६। पूजयेन्मातृकामित्थं नित्य साधकसत्तमः । न्यसेत्यर्गांन्वितां सृष्ट्या ध्यात्वा देवी यथाविधि । २७ सर्ग बिन्द्वन्तिका न्यस्येत् डार्णाद्यां स्थितिवर्त्मना । विद्यात्पूर्वोदितान्विद्वानृष्यादीनङ्गसंयुतान् । २८ ध्यायेदर्णेश्वरीमत्र वल्लभेन समन्विताम् । सिन्दूरकान्तिममिताभरणां त्रिनेत्रां विद्याक्षसूत्रमृगपोतवरंदधानाम्। पार्श्वस्थितां भगवतीमपि काञ्चनाङ्गींध्यायेत्कराब्जधृतपुस्तकवर्ण मालाम् ।२६ अभ्यर्चनादिक मर्वं विदध्यात्पूर्ववर्त्मना । बिन्दुयुक्तामिमां न्यस्येत्संहृत्याप्रतिलोमतः । ३०
षष्ठ पटल ] [ १२७ विद्यात्पूर्वोदितान्विद्वानृष्यादीनङ्गसंयुतान् । ध्येयावर्णमये पीठे देवी वाग्वल्लभा शिवा । ३१ अक्षस्रजं हरिणपोतमुद्ग्रटङ्कं विद्यां करैरविरतं दधती त्रिनेत्राम् । अर्द्धेन्दुमौलिमरुणामरविन्दवासां वर्णेश्वरी प्रणमतः स्तनभीरनम्राम् । ३२ न्यासार्चनादिकं सर्वं कुर्यात्पूर्वोक्तवर्त्मना तारोत्थाभिः कलाभिस्तां न्यसेत्साधकत्तमः । ३३ साधना करने वालों में श्रेष्ठ को चाहिए कि वह नित्य ही इसी रीति से मातृकाओं का अभ्यर्चन करे । देवी का विधि के अनुसार ध्यान करके सृष्टि से सर्गान्विता का न्यास करे । २७। सर्ग और बिन्दु जिसके अन्त में हैं तथा स्थिति के मार्ग से ङकार वर्ण की आदि वाली है । विद्वान् को चाहिए कि वह पूर्व में कथित अङ्गोंसे समन्वित ऋषि आदि का ज्ञान प्राप्त करें । २८। अपने वल्लभ से समन्वित वर्णेश्वरी का यहाँ पर ध्यान करना चाहिए । अब ध्यान बतलाया जाता है, सिन्दूर के समान वर्ण संयुत, अपरिमित आभूषणों से विभूषित, तीन नेत्रोंसे युक्त, विद्या, अक्षमाला और मृगपोत तथा वरदान का धारण करने वाली, करकमलों में पुस्तक और वर्णमाला को रखने वाली, पार्श्व में विराज- मान, काञ्चन के तुल्य अङ्गों वाली भगवती का भी ध्यान करे । २६। पूर्वोक्त मार्ग के द्वारा ही अभ्यर्चन आदि सबको करना चाहिए अप्रति लोम से संहार करके बिन्दु से अन्विती का न्यास करे । ३०। विद्वान् को उचित है कि पूर्व में वर्णित अङ्गों से समन्वित ऋषि आदि का ज्ञान प्राप्त करे । वर्णों से परिपूर्ण पीठ में वाग्वल्लभा शिवा देवी का ध्यान करना चाहिए। ३१। ध्यान-अपने करकमलोंके द्वारा अक्षमाला, मृगशिशु, उद्ग्र टङ्क और विद्या के निरन्तर धारण करने वाली, तीन नेत्रों से युक्त, मस्तक में अर्ध चन्द्र को रखती हुई, अरविन्दोंके वस्त्र से युक्त अरुण वर्ण वाली, और पीन स्तनों के भार से नीचे की ओर झुकी हुई
१२८ ] [ श्रीशारदा तिलक वर्णेश्वरी को प्रणाम करिये ।३२। न्यास और यजन प्रभृति सर्व पूर्व में कथित मार्ग द्वारा करना चाहिए। श्रेष्ठ साधक तारोत्थ कलाओं से उसका न्यास करे । ३३। वर्णाद्यास्तारसंयुक्ता न्यस्तव्यास्ता नमोन्विताः । ऋषिः प्रजापतिश्छन्दोगायत्रं समुदाहृतम्। ३४ कलात्मा वर्णजननी देवता शारदा स्मृता । ह्रस्वदीर्घान्तरगतैः षडङ्गं प्रणवै स्मृतम् । ३५ हस्तैः पद्मं रथाङ्गं गुणमथहरिणं पुस्तकं वर्णमालां टङ्कं । शुभ्रं कपालं वरममृतलसद्धेमकुम्भं वहन्तीम् । मुक्ता विद्युत्पयोदस्फटिकनवजपाबन्धूक पञ्चवक्त्रैः । त्र्यक्षैर्वक्षोजनम्रां सकलशशिनिभां शारदां ता नमामि । ३६ अर्चयेदुक्तमार्गेण शारदां सर्वकामदाम् । तार्तीयपूर्वां तां न्यस्यन्नमोऽन्तां रुद्रसंयुताम् । ३७ सधातुप्राणशक्त्यात्मयुक्तावादिषु ते क्रमात् । ऋषिः स्याद्दक्षिणामूर्तिर्गायत्रं छन्दईरितम् । ३८ अर्धनारीश्वरः प्रोक्तो देवता तन्त्रवेदिभिः । हृसा षड्दीर्घयुक्तेन कुर्यादङ्गानि देशिकः । ३६ अकारादि वर्णों के आदि वाली प्रणवसे युक्त तथा नमः-इस पद से समन्वित उनका न्यास करना चाहिये । इनका ऋषि प्रजापति है और छन्द गायत्र कहा गया है ।३४। कला के स्वरूप वाली, वर्णों को जनन करने वाली शारदाको इसका देवता बताया गया है । ह्रस्व और दीर्घ के अन्तर में स्थित प्रणवों के द्वारा षडङ्ग कहा गया है ।३५। अब ध्यान बतलाया जाता है-अपने कराम्बुजों के द्वारा पद्म, रथाङ्ग (चक्र)- गुण (अक्षमाला), हरिण, पुस्तक, वर्णमाला, टंक, शुभ्र कपाल- वरदान, अमृत से शोभित हेम के कुम्भ को वहन करती हुई, मुक्ता विद्युत पयोद, स्फटिक, नवीन जपा, बन्धूक पाँच मुखोंसे शोभित, तीन
षष्ठ पटल ] १२६ नेत्रों से समन्वित-वक्षोज (स्तन) के भार से विनम्र-पूर्ण, चन्द्र के तुल्य उस शारदा देवी को प्रणाम करता हूँ ।२६। समस्त कामनाओं के प्रदान करने वाली शारदा देवी का वर्णित मार्ग द्वारा अर्चन करना चाहिए । जिसके पूर्व में तार्त्तीय (भैरव का एक भेद) है और जिसके अन्त में 'नमः'—यह पद है ऐसी रुद्र संयुता उसका न्यास करे ।३७। वे रुद्र धातु अर्थात् त्वचा, रुधिर, माँस, वेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र-प्राण शक्ति और आत्मा यकारादि व्यापक देशों में क्रम से जानने चाहिए । इसका ऋषि दक्षिणा मूर्ति है और छन्द गायत्र कहा गया है ।३८। इसका देवता तन्त्र शास्त्र के ज्ञाताओं द्वारा अर्ध नारीश्वर बताये गये हैं। देशिक को चाहिए कि वह छः अर्थात् आ, ई, ऊ, ऐ, औ, अः दीर्घ युक्त छैः से हकार तथा सकार से अंगों को करे ।३६। बन्धूककाञ्चननिभं रुचिराक्षमालां पाशाङ्कुशौ च वरद निजबाहुदण्डै । विभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र मर्द्धाम्बिकेयमनिशं वपुराश्रयामः ॥४० पूर्वोक्तेनैव मार्गेण पूजतेत्त यथाविधि । स्मराद्यां मातृकां न्यस्येत्केशवादिनमोन्विताम् ॥४१ साधातुप्राणशक्त्यात्मयुक्ता यादिषु विष्णवः । ऋषिः प्रजापतिः प्रोक्तो गायत्रं छन्द ईरितम् ।४२ अर्द्धलक्ष्मीर्हरिः साक्षाद्देवतात्र समीरिता । दीर्घयुक्तादिबीजेन षडङ्गानि समाचरेत् ॥४३ हस्तैर्विभत्सरसिजगदाशंखचक्राणि विद्यां- पद्मादर्शौ कनककलशं मेघविद्युद्विलासम् । वामोत्तुक्तस्तनमविरलाकल्पमाश्लेषलोभा- देकीभूतं वपुरवतु वः पुण्डरीकाक्षलक्ष्योः ॥४४ अब ध्यान बताया जाता है-बन्धूक और सुवर्ण के तुल्य, अपने बहु- दण्डों के द्वारा रुचिर अक्षमाला, पाश, अंकुश और वरदान को धारण
१३० ] [ श्री शारदा तिलक करने वाले चन्द्र खण्ड के आभरण से भूषित, तीन नेत्र धारी, ऐसे अर्धा- म्बिकेय वपु का होम समाश्रय ग्रहण करते हैं ।४०। पूर्व में बतलाते हुए मार्ग के ही द्वारा विधि के सहित उनका अर्चन करना चाहिए । जिसके आदि में केशव हो और नमः इस पद से समन्वित हो ऐसी स्मराद्य मातृका का कर न्यास करना चाहिए ।४१। वह धातुएं, त्वचा सृक् मांसादि, प्राण शक्ति और आत्मा से युक्त मकारादि में क्रम से हैं । इसका ऋषि प्रजापति और छन्द गायत्र कहा गया है ।४२। अर्ध लक्ष्मी हरि को यहाँ पर साक्षात देवता को कहा गया है। दीर्घ छः हैं जो अभी पूर्व में बताये गए हैं । इनसे युक्त आदि बीज से षट् अंगों का समाचरण करना चाहिए ।३३। अब ध्यान है—अपने करों से सरसिज, गदा, शंख, विद्या परम-आदर्श (दर्पण)-मेघ की विद्युत के विलास से संयुक्त सुवर्ण निर्मित कलशको धारण करने वाले, वाम भागमें अविरला कल्प उत्तुंग स्तन के आश्लेष के लोभ से ऐकीभूत पुण्डरीकाक्ष और लक्ष्मी का वपु रक्षा करे ।४४। अत्रार्चनादिकं सर्वं प्राग्वन्मन्त्री समाचरेत् । शक्तिपूर्वा तनौ न्यस्येन्मातृकां मन्त्रवित्तमः ।४५ ऋषिः शक्तिः स्मृतं छन्दोगायत्रं देवता बुधैः । संप्रोक्ता विश्वजननी सर्वसौभाग्यदायिनी ।४६ दीर्घाद्धेन्दुयुजाङ्गानि कुर्यान्मायात्मना बुधः ।४७ उद्यत्कोटिदिवाकरप्रतिभरोत्तुङ्गोरूपीनस्तनीं बद्धार्द्धेन्दुकिरीटहाररसनामञ्जीर संशोभिता । विभ्राणा करपंकजैर्जपवटीं पाशाङ्कुशौ पुस्तकं दिश्याद्वो जगदीश्वरी त्रिनयना पद्म निषण्णा सुखम् ॥४८ पुरोदितेन विधिना देवीमन्वहमर्चयेत् । न्यसेच्छ्रीबीजसंपन्नां मातृकां विधिना तनौ ।४६ ऋषिर्भृगुः स्मृतं छंदो गायत्रं, देवता स्मृता । समस्तसम्पदामादिर्जगतां नायिका बुधैः ।५० प्रावप्रस्तुतेन बीजेन कुर्यादङ्गानि साधकः ।५१
षष्ठ पटल } [ १३१ यहाँ पर मन्त्रधारी व्यक्ति अर्चन आदि सब कर्म का पूर्व की ही भाँति समाचरण करे । मन्त्र वेत्ताओं में श्रेष्ठ पुरुष तनु में पूर्व में शक्ति से समन्वित मातृका का न्यास करे ।४५। बुधों के द्वारा इसका ऋषि शक्ति, गायत्र छन्द और देवता सब प्रकार के सौभाग्यों का प्रदान करने वाली विश्व जननी को कहा गया है ।४६। बुद्ध पुरुष छै दीर्घ जो कि अभी पूर्व कहे गये हैं—अर्धेन्दु-विन्दु, इससे युक्त माय्य के स्वरूप वाले बीज से अंगों का समाचरण करे ।४७। अब ध्यान कहा जाता है—उगते हुए करोड़ों दिवाकरों के समान प्रतिभा, ऊँचे और पीन स्तनों से शोभित कर कमलों के द्वारा जपवटी, पाश, अंकुश, पुस्तक को धारण करने वाली, तीन नयनों से समन्वित, पद्मासन पर सुखपूर्वक विराज- मान जगदीश्वरी आपका कल्याण करे ।४८। पूर्वमें वर्णित विधि-विधान से ही प्रतिदिन देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए । और विधि के साथ ही तनु में श्रीबीज से सुसम्पन्ना मातृका का न्यास करे ।४६। इसका ऋषि भृगु-छन्द गायत्र और इसका देवता बुधों के द्वारा सम्पूर्ण सम्प- दाओं की आदि जगतों की नायिका कही गयी है ।५०। साधक पूर्व में प्रस्तुत बीज के द्वारा अङ्गों को करे ।५१। विद्युद्दामसमप्रभां हिमगिरिप्रख्यैश्चतुर्भिर्गजैः । शुण्डादण्डसमुद्धृतामृतघटैरासिच्यमानामिमाम् ।५१ बिभ्राणां करपङ्कजैर्जपवटीं पद्मद्वयं पुस्तकम् । भास्वद्रत्नसमुज्ज्वलां कुचनतां ध्यायेज्जगत्स्वामिनीम् ।५२ आराधयेदिमां प्रोक्तावर्त्मना कुसुमादिभिः । न्यसेत्स्कराद्यां वपुषि मातृकां मङ्गलप्रदाम् ।५३ ऋषिः संमोहनः प्रोक्तश्छन्दो गायत्रमुच्यते । देवता मंत्रिभिः प्रोक्ता समस्तजननी परा ।५४ स्मरेण दीर्घयुक्तेन विदध्यादङ्गकल्पनम् ।५५ बालार्ककोटिरुचिरां स्फटिकाक्षमालां कोदण्डमिक्षुजनितं स्मरपञ्चबाणान् ॥
१३२ [ श्री शारदा तिलक विद्यां च हस्तकमलैर्दधतीं त्रिनेत्रां ध्यायेत्समस्तजननीं नवचन्द्रचूडाम् ॥५६ ध्यान—विद्युल्लता के सदृश प्रभा से अन्विता, हिमवान् पर्वत के समान अर्थात् विशाल चार गजों के द्वारा सूड़ों के द्वारा समुद्धृत अमृत के कलशों से अभिषिञ्चन की गयी, कर कमलों से जपवटी, दो परम पुस्तक को धारण करने वाली, देदीप्यमान रत्नों के समुदाय से समु- ज्ज्वल, स्थूल कुचों के भार से नीचे की ओर झुकी हुई जगतों की स्वा- मिनी का ध्यान करना चाहिए ।५२। पूर्व में वर्णन की हुई विधि से कुसुम आदि उपचारों के द्वारा इनकी आराधना करनी चाहिए । स्म- राद्या-मंगलों की प्रदात्री मातृका शरीर में न्यास करे ।५३। इसका ऋषि सम्मोहन और छन्द गायत्र कहा जाता है। मन्त्र धारियों ने इसका देवता परा समस्त जननी बताया है ।५४। दीर्घों से युक्त स्मर से अंगों की कल्पना करनी चाहिए ।५५। ध्यान कहा जाता है—करोड़ों बाल सूर्यों के समान रुचिरा, हस्त कमलों के द्वारा स्फटिकाक्षों की माला, इक्षुजनित कोदण्ड स्मर (कामदेव) के पाँच वाण और विद्या को धारण करनी वाली, तीन नेत्रों से अन्वित, नवीन चन्द्र को चूड़ा में रखने वाली समस्तों को जन्म देने वाली का ध्यान करना चाहिए ।५६। अर्चनाविक्रियाः सर्वाः प्रोक्ताः पूर्वविधानतः । शक्तिश्रीकामबीजाढ्यां देवी वर्णतनुं भजेत् ।५७ ऋषिः पूर्वोदितश्छन्दोगायत्रं, देवता बुधैः । सम्मोहनी समुद्दिष्टा सर्वलोकवशङ्करी ।५८ आवर्तितैस्त्रिभिर्बीजैः षडङ्गानि प्रकल्पयेत् ।।५६ ध्यायेयमक्षवलयेक्षुशरासपाशान् पद्मद्वयाङ्कुशशरान्नवपुस्तकञ्च। आविभ्रतीं निजकरैररुणां कुचार्त्ता संमोहिनीं त्रिनयनां तरुणेन्दु- चूडाम् ।६० यजेदावरणैः सार्द्धमुमचारैः सुशोभनाम् । प्रपञ्चयाग वक्ष्यामि सच्चिदानन्दसिद्धिदम् ।६१
षष्ठ पटल ] १३३ वेदादिशक्तिरजपा परमात्ममहामनुः । वह्नेर्जाया च कथिताः पञ्चमन्त्राः शुभावहाः ॥६२ तारशक्त्यादिकां न्यस्येदजपाऽऽत्मद्विठान्तिकाम्। मातृकामुक्तमार्गेण सृष्ट्या देहे विधानवित् ॥६३ ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दो गायत्रमीरितम्। समस्तवर्णसं व्याप्तं परं तेजोऽस्य देवता ॥६४ अर्चन आदि की पूर्ण क्रिया सभी पूर्व विधान से कही गयी है । शक्ति,श्री, काम बीजाद्या, वर्ण तनु वाली देवी का ध्यान करना चाहिये। ।५७। बुधों के द्वारा ऋषि पूर्व में कहा गया है। छन्द इसका गायत्र होता है और इसका देवता सब लोकों को वश में करने वाली सम्मोहनी बताया गया है ।५८। अवर्तित तीन बीजों से षडङ्गों की कल्पना करनी चाहिए ।५६। (ध्यान) अपने कर कमलों के द्वारा अक्ष वलय, इक्षु,धनुष, पाश, दो पद्म, अंकुश, शर, नव पुस्तक को धारण करने वाली, अरुण वर्ण वाली, पीन एवं उत्तुङ्ग कुच युग के भार से पीड़ित, तीन नयनों की धारिणी, तरुण चन्द्र को अपनी चूड़ा में रखने वाली सम्मोहनी का ध्यान करता हूँ ।६०। उपचारों के द्वारा आवरणों के सहित सुशोभना का अभ्यर्चन करना चाहिए । अब प्रपञ्चयाग के विषय में बतलाया जायेगा जो सच्चिदानन्द की सिद्धि के प्रदान करने वाला होता है । वेदादि प्रणव, शक्ति, अजपा-हंस, परमात्मा का महामन्त्र-सोऽहम्, वह्नि की जाया, स्वाहा के पाँच मन्त्र परम शुभके आवाहन करने वाले कहे गये हैं ।६१।६२। आत्मा-परमात्मा का मन्त्र, अजपा पूर्व में अभी बताया गया है, और अन्त में दो प्रकार वाली अर्थात् द्वन्द्व इस रूप वाली तारशक्ति आदिक का न्यास करे । विधान के ज्ञान रखने वाला पुरुष देह में सृजन से कथित मार्ग के द्वारा मातृका न्यास करे । इसका ऋषि ब्रह्मा कहे गए हैं और छन्द गायत्र बताया गया है । समस्त वर्णों में भली भाँति व्याप्त परम तेज ही इसका देवता होता है ।६३।६४।
१३४ ] [ श्री शारदा तिलक स्वाहाद्यैः पञ्चमनुभिः पञ्चाङ्गानि प्रकल्पयेत् । अस्त्रं दिक्षु बुधः कुर्याद्भूयो हरिहराक्षरैः ।६५ तारा दिपञ्चमनुभिः परिचीयमानं मानैरगम्यमनिशं जगदेकमूलम् । सच्चित्समस्तगमनश्वरमच्युतं तत्तेजः परम्भजत सान्द्रसुधाम्बुराशिम् ।।६६ पञ्चभूतमया वर्णा वर्गेभ्यः प्रागुदीरिताः । तस्माज ज्ञानेन्द्रियात्मानः प्रपञ्च मन्मयं विदुः ।६७ देहोऽपि तादृशस्तस्मिन्न्यसेद्वर्णान्विलोमतः । तत्तत्स्थानयुतान्मन्त्री जुहुयात् परतेजसि ।६८ एवं वर्णमयं होमं कृत्वा दिव्यतनुर्भवेत् । न्यस्य मन्त्री यथान्यायं देहे विश्वस्य मातरम् ।६६ जपेन्मन्त्रान्भजेद्देवान्यजेदग्निमनन्यधीः । द्रव्यैश्च जुहुयादग्नौ मन्त्रवित्तन्त्रचोदितैः ।७० स्वाहा आदि पाँच मन्त्रों के द्वारा पांच अंगों की कल्पना करनी चाहिए । बुध पुरुष अस्त्र को दिशाओं में करे और पुनः हरिहर अक्षरों के द्वारा करना चाहिए । ध्यान बतलाया जाता है—तारा आदि पाँच मन्त्रों के द्वारा परिचीयमान-मन्त्रों के द्वारा अगम्य-निरन्तर जगतों का एकमात्र मूल-सच्चित् समस्त में गमन करने वाले-अनश्वर अर्थात् नित्य एवं नाश रहित-अच्युत-सान्द्र (सघन) सुधा का महा सागर उस परम तेज का सेवन करो ।६५।६६। वर्ण पाँच भूतों के स्वरूप वाले होते हैं । जो पूर्व में ही वर्गों के द्वारा कहे गए हैं । इस कारण से ज्ञानेन्द्रियों के स्वरूप वाले प्रपंच को तन्मय कहा करते हैं ।६७। यह देह भी ठीक उसी भांति का होता है विलोमसे वर्णों का न्यास करना चाहिए । मन्त्रधारी उस-उस स्थान से युक्तों का पर तेज में हवन करे ।६८। इसी रीति से वर्णों के स्वरूप वाले होम को करके होम करने वाला दिव्य शरीर से युक्त हो जाया करता है । मन्त्र को धारण करने वाला पुरुष न्याय के
षष्ठ पटल ] [ १३५ अनुसार विश्व की माता का देह में न्यास करे ।६६। अनन्यधी वाले को चाहिए कि वह मन्त्रों का जप करे—देवगणों का सेवन करे और उसको अग्नियों का यजन करना चाहिए । मन्त्रों के ज्ञान रखने वाले पुरुष को तन्त्र ग्रन्थों में बताये हुए द्रव्यों के द्वारा अग्नि में हवन करना चाहिए ।७०। अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षन्यग्रोधसमिधस्तिलाः । सिद्धार्थपायसाज्यानि द्रव्याण्यष्टौ विदुर्बुधाः ।७१ अमीभिर्जुहुयाल्लक्षं तदर्द्धं वा समाहितः । सर्वान्कामानवाप्नोति परां सिद्धिं च विन्दति ।७२ एभिरर्कसहस्राणि हुत्वा मन्त्रो विनाशयेत् । रिपून्क्षुद्रग्रहान्भूतान् ज्वराञ्छपांश्च पन्नगान् ।७३ मन्त्राणामयथावृत्तिप्रतिपाद्यसमुद्भवान् । विकारान्नाशयेदाशु होमोऽयं समुदीरितः ।७४ एभिस्त्रिमधुरोपेतै र्जुहुयाल्लक्षमानतः । अचिरादेव स सवेत्साक्षाद्भूमिपुरन्दरः ।७५ बुधजन हवन करने के लिए आठ द्रव्यों को बतलाते हैं—पीपल, गूलर, पाकड़ वट की समिधायें, तिल सिद्धार्थ, पायस और घृत ये आठ हैं ।७१। इन्हीं उक्त द्रव्योंके द्वारा एक लाख आहुतियाँ देनी चाहिए । अथवा परम सावधान होकर उसका आधा भाग अर्थात् पचास हजार आहुतियाँ देवे । ऐसा होम करने वाला पुरुष अपनी सभी मनोवञ्छित कामनाओं की प्राप्ति किया करता है और उसको परासिद्धि प्राप्त हो जाया करती है ।७२। इनके ही द्वारा बारह सहस्र आहुतियाँ देकर मन्त्र धारी शत्रुओं को, क्षुद्रग्रहों को, भूतों को ज्वरों को, शापों को, पलगों को विनष्ट कर दिया करता है ।७३। मन्त्रों की अथवा वृत्ति की प्रति- पत्ति से समुत्पन्न विकारों को बहुत ही शीघ्र यह होम नाश कर दिया करता है—ऐसा ही इसको कहा गया गया है ।७४। तीन मधुरों से उपेत इनके द्वारा एक लाख प्रमाण वाली आहुतियाँ देवे तो वह होम
१३६ [ श्री शारदा तिलक कर्त्ता पुरुष अविलम्ब ही थोड़े समय में साक्षात् भू मण्डल का इन्द्र हो जाया करता है ।७५ अमीभिः साधको हुत्वा वश्यादीनापि साधयेत् । हुत्वा लक्षं तिलैः शुद्धैर्मुच्यते सर्वपातकैः ।७६ पायसान्नेव जुहुयान्मन्त्री सर्वसमृद्धये । पद्मानां लक्षहोमेन महतीं श्रियमाप्नुयात् ।७७ घृतेन जुहुयाल्लक्षं प्राप्नुयात् कीर्त्तिमुत्तमाम् । जातीकुसुमहोमेन सर्वलोकं वशं नयेत् ।७८ संशोधितैस्त्रिमध्वक्तैर्लवणैर्लक्षमानतः । जूहूयाद्गुलिकाः कृत्वा वशयेत्सर्वमञ्जसा ।७९ लिखित्वा पत्रखण्डेषु मातृकार्णान्पृथक् पृथक् । अभ्यर्च्य जुहुयाद्वह्नौ तत्पत्राक्षरमुच्चरन् ।८० अभिचारहरो होमः सर्वरक्षाप्रसिद्धिदः । सहस्रहोमे वितरेद्दक्षिणान्निष्कमानतः ।८१ साधना करने वाला पुरुष इनके द्वारा हवन करके वश्य आदि को भी साधित कर लिया करता है। शुद्ध तिलों के ही द्वारा होम करके जो कि एक लाख आहुतियों को होना चाहिए, मनुष्य समस्त पातकों से छुटकारा पा जाया करता है ।७६। मन्त्रधारी पुरुष सब प्रकार की समृद्धि की प्राप्ति करने के लिये पायसान्न के द्वारा होम करे। एक लाख पद्मों के होम करने से मनुष्य बड़ी भारी श्री की प्राप्ति किया करता है ।७७। घृत से एक लाख आहुतियों के द्वारा होम करे तो वह उत्तम कीर्ति को प्राप्ति कर लिया करता है। जाती के कुसुमों के द्वारा होम करने से सम्पूर्ण लोक को अपने वश में कर लिया करता है। ।७८। संशोधित तीन मधुरों से अक्त लवणों से एक लाख मान वाला होम करे और गुलिका बनाकर करे तो तुरन्त ही सबको अपने वश में कर लिया करता है ।७६। पत्रों के खण्डों में मातृका के वर्णों को पृथक्- पृथक् लिखकर फिर उनका अभ्यर्चन करे और इसके अनन्तर उन पत्रों
षष्ठ पटल ] १३७ के अक्षरों को मुख से उच्चारण करते हुए अग्नि से होम करे तो यह होम अभिचार के हरण करने वाला होता है और सबसे रक्षा करने वाला तथा प्रसिद्धि के देने वाला हुआ करता है। एक सहस्र के होम में एक निष्क प्रमाण की अवधि वाली दक्षिणा का वितरण करना चाहिए। = : ० ८ ५ । अर्द्धं वा शक्तितोद्याद्यथोक्तं फलमाप्नुयात् । तनया सप्त सञ्जप्तं पिवेत्प्रातर्दिने दिने ।८२ सलिलं स भवेद्वाग्मी लभते कवितां पराम् । ब्राह्मीरस वचा कल्कै पयसा विपचेद् घृतम् ।८३ अयुतं मातृकाजप्तमर्चितं च विधानतः । पिवेत्प्रातः स मेधावी भवेद्वाक्पतिसत्तमः ।८४ ब्राह्मीसहस्रसंजप्तां वचां वा पयसा पिवेत् । स लभेन्महतीं मेधामचिरान्नात्र संशयः ।८५ पूर्वोक्तं पङ्कज कृत्वा कुम्भं संस्थाप्य पूर्ववत् । क्वाथेन पूरयेन्मन्त्री यथावत् क्षीरशाखिनाम् ।८६ अष्टगन्धं विलोड्यास्मिन्नवरत्नसमन्विते । आवाह्य पूजयेद्देवीं मातृकामुक्तमार्गतः ।८७ अथवा एक निष्क सुवर्ण की दक्षिणा देने की शक्ति न होवे तो अपनी शक्ति के अनुसार ही देवें या आधा निष्क देवें । जैसा कहा गया है इसका भी वैसा ही फल प्राप्त किया करता है। इसके द्वारा सात बार जप किये हुए का प्रातःकाल में प्रतिदिन जल का पान करे तो वह पीने वाला वाग्मी हो जाता है और परम कवित्व की शक्ति का लाभ लिया करता है । ब्राह्मी बूँटी का रस और वच के कल्क को दूध के साथ घृत का पाचन करे और दश सहस्र मातृका के द्वारा अभिमन्त्रित और विधान से समचित करके प्रातःकाल पान करें तो वह परम मेधावी और श्रेष्ठ वाक्पति हो जाया करता है ।८२।८४। एक सहस्रवार जप की हुई ब्राह्मी अथवा वच को दूध के साथ पीवे तो वह पुरुष बड़ी भारी
• १३८ ] [ श्री शारदा तिलक मेधा का लाभ करता है और शीघ्र ही किया करता है—इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है ।८५। पूर्व में वर्णित किए हुये पद्म को बनाकर पहिली की भाँति कुम्भ की संस्थापना करे । फिर मन्त्रधारी पुरुष क्षीर वाले वृक्षों के क्वाथ से उसे पूरित कर देवे ।८६। इसमें अष्टगन्ध को विलोडित करके उसे नौ प्रकार के रत्नों से समन्वित कर देवे । फिर उसमें पूर्व में कहे हुए मार्ग के द्वारा मातृका देवी का आवाहन करके उसका पूजन करना चाहिये ।८७। सहस्रासाधितैस्तोयैरभिषिञ्चेत्प्रियं नरम् । भानुवार' शेभे लग्ने ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।८८ गुरवे दक्षिणां दद्याद् भक्तियुक्तः स्वशक्तितः । रक्षाकरं विशेषेण कृत्वा द्रोहोपशान्तिदम् ।८६ ऐश्वर्यजननं पुंसां सर्वसौभाग्यसिद्धिदम् । अभिषेकमिमं प्राहर्विश्वसंवननं (मोहनं) परम् ।६० पूर्वोक्तं मण्डलं कृत्वा मन्त्री नवपदान्वितम् । मध्यादि स्थापयेत्तेषु पदेषु कलशान्नव ।६१ तन्तुभिर्वेष्टितान् शुद्धान्वहिश्चन्दनचर्चितान् । सुधूपवासितान् मन्त्री दूर्वाक्षतसमन्वितान् '६२ एक सहस्र वार साधित अर्थात् अभिमन्त्रित जल से अपने प्रिय मानव का अभिषिञ्चन करना चाहिए । रविवार के दिन किसी परम शुभ लग्न में करे और ब्राह्मणो को भी भोजन कराना चाहिए ।८८। भक्ति की भावना से समन्वित होकर अपनी शक्ति के अनुसार गुरुदेव को दक्षिणा समर्पित करे । यह द्रोह की उपशान्ति का देने वाला विशेष रूप से रक्षा के करने वाला होता है । यह पुरुष के ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाला है और सब सौभाग्य की सिद्धि का प्रदाता होता है । इस अभिषेक को मनीषीगण विश्व का पर मोहन करने वाला कहा करते हैं ।८६।६०। मन्त्रधारी पूर्वमें कथित नौ पदोंसे समन्वित मण्डल बनावे, मध्यादि में उन पदों में नौ कलशों की स्थापना करनी चाहिए ।६१।
षष्ठ पटल ] [ १३६ उनको तन्तुओं से वेष्टित करे और शुद्धतापूर्वक वाहिर चन्दन से चर्चित कर देना चाहिए । मन्त्रधारी पुरुष उनको सुन्दर धूप से सुवासित करे और दूर्वा तथा अक्षतों से अन्वित कर देवे ।६२। आपूर्य शुद्धतोयैस्तु (स्तान्) वेष्टयेदंऽशुकैस्तुतान् । मुक्तामाणिक्यवैदूर्यगोमेदान्वज्रविद्रुमौ ।६३ पुष्परागं मरकतं गरुडोन्दारमेव च । उक्तानि नव रत्नानि तेषु कुम्भेषु निःक्षिपेत् ।६४ विष्णुक्रान्तामिन्द्रवल्लीं देवीं दूर्वाश्व निःक्षिपेत् । स्थापयेत्कुम्भवक्त्रं षु कङ्कोलांश्चूतपल्लवान् ।६५ विन्यसेदक्षतोपेतांश्च फलान्वितान् । मध्येकुम्भं समाराध्य देवी मन्त्री वृषादितः ।६६ अर्चयेद्दिक्षु कुम्भेषु व्यापिन्याद्याः पुरोदिताः । वर्णमन्त्रयुता प्रोक्तलक्षणः सर्वसिद्धिदाः ।६७ शर्कराघृतसंयुक्तं पायसं च निवेदयेत् । स्पृष्ट्वा कुम्भान्कुशैर्विद्यां जपेत्साग्रंशतं शतम् ।६८ फिर उन कलशों को शुद्धि जल से आपूरित करे और उनको वस्त्रों से वेष्टित कर देना चाहिए । नौ रत्नों के नाम—मुक्ता, माणिक— वैदूर्य्य—गोमेद—वज्र (हीरा)—विद्रुम—पुष्पराग मरकल—गरु- डोन्दार ये नौ रत्न होते हैं । इन नौ रत्नो के नाम बता दिए गए हैं इनको उन कलशों में डाल देना चाहिए ।६३।६४। फिर उनमें विष्णु क्रान्ता—इन्द्र वल्ली—देवी और दूर्वा का निक्षेप करे । उन कुम्भों के मुखों में कंकोल और आम्र के पत्तों को स्थापित कर देना चाहिये ।६३। ।६५। वहाँ पर अक्षतों से उपेत तथा फलोंसे अन्वित चषकों का विन्यास करे । मध्य में जो कुम्भ है वहां पर मन्त्रधारी देवी की समाराधना करके वृषादि से दिशाओं में कुम्भों में पूर्व में उदित व्यापिनी आदि का अर्चन करना चाहिए । पूर्व में कहे हुए लक्षणों से युक्त-वर्ण और मन्त्र से युक्त सब सिद्धियों की प्रदात्री है ।६७। शर्करा और घृत
१४० [ श्री शारदा तिलक से संयुक्त पायस को निवेदित करे । कुशाओं से कुम्भों का स्पर्श करके साग्रशत-शत विद्या का जप करना चाहिए ।६८। अभिषिञ्चेद्विलोमेन साध्यं त दत्तदक्षिणम् । सर्वपापक्षयकरं शुभदं शान्तिसिद्धिदम् । ६६ कृत्याद्रोहादिशमनं सौभाग्यश्रीजयप्रदम् । पुत्रप्रदं च वन्ध्यागामभिषेकमम्विदुः ।१०० ज्वरार्त्तं स्वपूरः स्थित्वा जपेत्साग्रं सहस्रकम् । ज्वरो नश्यति तस्याश क्षुद्रभूतग्रहा अपि ।१०१ परतेजसि सञ्चिन्त्य शुभ्रं स्रुतसुधामयम् । विधुं विद्यां जपेद्योगो त्रिषरोगविनाशकृत् ।१०२ बलीपलितरोगघ्नः क्षुत्पिपासाप्रणाशनः । पुष्टिदः सर्वसौभाग्यदायी लक्ष्मीशुभप्रदः ।१०३ विलोम से दी हुई दक्षिणा वाले उस साध्य का अभिषिञ्चन करना चाहिए । यह अभिषेक समस्त पापोंके क्षय कर देने वाला शुभोंका दाता और शान्ति तथा सिद्धि के देने वाला होता है । यह कृत्या के दोषों का प्रशमन करने वाला—सौभाग्य, श्री और जय के देने वाला है । यह अभिषेक वन्ध्या नारी को पुत्र प्रदान करने वाला होता है । ।६६-१०० जो मनुष्य ज्वर से आर्त्त होवे उसके आगे स्थित होकर साग्रसहस्र वार जप करे तो उसका ज्वर शीघ्र ही नष्ट हो जाया करता है और क्षुद्र भूत ग्रह भी विनष्ट हो जाया करते हैं ।१०१। पर तेज में शुभ्र स्रुत सुधामय को सञ्चिन्त्य करके विधु विद्या का जप करे तो यह योग विष- रोग के विनाश करने वाला होता है ।१०२। वली और पलित के रोग का नाशक तथा क्षुधा और पिपासा के विनाश करने वाला है। यह पुष्टि का दाता—सब प्रकार के सौभाग्य का प्रदाता और लक्ष्मी एव शुभ का देने वाला है ।१०३। सोमसूर्याग्निरूपाः स्युर्वर्णाः लोहत्रयं तथा । रौप्यमिन्दुः स्मृतो हेम सूर्य्यताम्रं हुताशनः ।१०४