शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ पटल ] [ १२७ विद्यात्पूर्वोदितान्विद्वानृष्यादीनङ्गसंयुतान् । ध्येयावर्णमये पीठे देवी वाग्वल्लभा शिवा । ३१ अक्षस्रजं हरिणपोतमुद्ग्रटङ्कं विद्यां करैरविरतं दधती त्रिनेत्राम् । अर्द्धेन्दुमौलिमरुणामरविन्दवासां वर्णेश्वरी प्रणमतः स्तनभीरनम्राम् । ३२ न्यासार्चनादिकं सर्वं कुर्यात्पूर्वोक्तवर्त्मना तारोत्थाभिः कलाभिस्तां न्यसेत्साधकत्तमः । ३३ साधना करने वालों में श्रेष्ठ को चाहिए कि वह नित्य ही इसी रीति से मातृकाओं का अभ्यर्चन करे । देवी का विधि के अनुसार ध्यान करके सृष्टि से सर्गान्विता का न्यास करे । २७। सर्ग और बिन्दु जिसके अन्त में हैं तथा स्थिति के मार्ग से ङकार वर्ण की आदि वाली है । विद्वान् को चाहिए कि वह पूर्व में कथित अङ्गोंसे समन्वित ऋषि आदि का ज्ञान प्राप्त करें । २८। अपने वल्लभ से समन्वित वर्णेश्वरी का यहाँ पर ध्यान करना चाहिए । अब ध्यान बतलाया जाता है, सिन्दूर के समान वर्ण संयुत, अपरिमित आभूषणों से विभूषित, तीन नेत्रोंसे युक्त, विद्या, अक्षमाला और मृगपोत तथा वरदान का धारण करने वाली, करकमलों में पुस्तक और वर्णमाला को रखने वाली, पार्श्व में विराज- मान, काञ्चन के तुल्य अङ्गों वाली भगवती का भी ध्यान करे । २६। पूर्वोक्त मार्ग के द्वारा ही अभ्यर्चन आदि सबको करना चाहिए अप्रति लोम से संहार करके बिन्दु से अन्विती का न्यास करे । ३०। विद्वान् को उचित है कि पूर्व में वर्णित अङ्गों से समन्वित ऋषि आदि का ज्ञान प्राप्त करे । वर्णों से परिपूर्ण पीठ में वाग्वल्लभा शिवा देवी का ध्यान करना चाहिए। ३१। ध्यान-अपने करकमलोंके द्वारा अक्षमाला, मृगशिशु, उद्ग्र टङ्क और विद्या के निरन्तर धारण करने वाली, तीन नेत्रों से युक्त, मस्तक में अर्ध चन्द्र को रखती हुई, अरविन्दोंके वस्त्र से युक्त अरुण वर्ण वाली, और पीन स्तनों के भार से नीचे की ओर झुकी हुई