भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 511 में से

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१२६ ] [ श्रीशारदा तिलक शूलं कृपाणं नृशिर कपालं दधती करः । मुण्डस्रङ् मण्डिता ध्येया चामुण्डा रक्तविग्रहा । २५ अक्षस्रजं बीजकपूरं कपालं पंकजं करै । वहन्ती हेमसंङ्काशा महालक्ष्मीः समीरिता । २६ वैष्णवी तमाल के समान श्यामल वर्ण से सयुत है और विभ्रमों के द्वारा परम उज्ज्वल हैं ऐसे ही स्वरूप वाली का ध्यान करना चाहिए । वह चक्र-घण्टा-कपाल और शंख को कर कमलों में धारण करने वाली है ।२२। वाराही काले मेघ के तुल्य छवि वाली है-ऐसा ही ध्यान करे । यह अपने चार कर कमलों द्वारा मुशलकर बाल-खेटक और हल को धारण करने वाली है ।२३। इन्द्रनील मणि के सदृश समस्त समृद्धियों के प्रदान करने वाली इन्द्राणी का ध्यान करना चाहिए जो करों में अंकुश, तोमर, विद्युत और कुलिश को धारण करने वाली है ।२४। रक्त शरीर वाली और मुण्डस्रक् से मन्डित चामुन्डा देवी का ध्यान करना चाहिए, जो शूल, कृपाण, नरमुन्ड, और कपालको करों में धारण करने वाली है । महालक्ष्मी का स्वरूप सुवर्ण के सदृश बताया गया है जो अपने कर-कमलोंमें अक्षमाला, बीजपूर-कपाल और पंकज को धारण करने वाली है ।२५-२६। पूजयेन्मातृकामित्थं नित्य साधकसत्तमः । न्यसेत्यर्गांन्वितां सृष्ट्या ध्यात्वा देवी यथाविधि । २७ सर्ग बिन्द्वन्तिका न्यस्येत् डार्णाद्यां स्थितिवर्त्मना । विद्यात्पूर्वोदितान्विद्वानृष्यादीनङ्गसंयुतान् । २८ ध्यायेदर्णेश्वरीमत्र वल्लभेन समन्विताम् । सिन्दूरकान्तिममिताभरणां त्रिनेत्रां विद्याक्षसूत्रमृगपोतवरंदधानाम्। पार्श्वस्थितां भगवतीमपि काञ्चनाङ्गींध्यायेत्कराब्जधृतपुस्तकवर्ण मालाम् ।२६ अभ्यर्चनादिक मर्वं विदध्यात्पूर्ववर्त्मना । बिन्दुयुक्तामिमां न्यस्येत्संहृत्याप्रतिलोमतः । ३०

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