भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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षष्ठ पटय ] [ १२५ शूलं परश्वधं क्षुद्रं दुन्दुभिं नृकरोटिकाम् । वहन्तो हिमशङ्काशा ध्येया माहेश्वरी शुभा ।२० अङ्कुशं दण्डखट्वाङ्गौ पाशं च दधती करैः । बन्धूकपुष्पसङ्काशा कौमारी कामदायिनी ।२१ वज्र रादि लोकपालों के आयुधों के द्वारा सातवाँ आवरण कहा गया है। इसी विधि से उपचारों के द्वारा वर्णेशी का पूजन करना चाहिए । १५ । व्यापिनी, नागिनी, पाविनी, क्लेदिनी, धारिणी मालिनी, हंसिनी, शंखिनी बताई गई हैं। १६। इन परम शुभ्रों का जो अक्षों की माला और पुस्तक को धारण किये हैं पत्रों में पूजनी चाहिए । फिर ब्राह्मी, महेश्वरी कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और सातवीं चामुण्डा मानी गई हैं ।१७। आठवी महालक्ष्मी है, ये विश्व की माताएं कही गई हैं ।१८। अब इनका स्वरूप बतलाया जाता है। ब्राह्मी सुवर्ण की कान्ति से युक्त है और कृष्ण अजिन से समुज्ज्वला है। यह अपने करकमलों के द्वारा दन्ड, कमण्डलु, अक्ष माला और अभयदान को धारण करने वाली है ।१६। परम शुभ माहे श्वरी का फिर ध्यान करना चाहिए जो शूल, परशु, वधा क्षु दुन्दुभि, नृकरोटिका को धारण करती हुई है और हिम के समान स्वरू- वाली हैं । २० । कौमारी कामनाओं के प्रदान करने वाली है और बन्धूक के पुष्प के सदृश वर्ण वाली हैं। यह अपने करों में अंकुश, खट्वाङ्ग, दन्ड और पाश को धारण करने वाली है ।२१। चक्रं घण्टां कपालं च शंख च दधता करैः । तमालश्यामला ध्येया वैष्णवी विभ्र्मोज्ज्वला ।२२ मुशलं करवालं च खेटकं दधती हलम् । करैश्चतुर्भिर्वाराही ध्येया कालघनच्छविः ।२३ अंकुशं तोमरं विद्युत्कुलिशं विभ्रती करैः । इन्द्रनीलनिभेन्द्राणी ध्येया सर्वसमृद्धिदा ।२४