शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ ] [ श्रीशारदा तिलक करना चाहिए। जाप की संख्या से विद्वान् को दश सहस्र मधुर से आप्लुत तिलों के द्वारा होम करे और मातृका का प्रतिदिन जप करना चाहिये ।८-६। व्योम, हकार, इन्दु, क्षःओ, स्वरूप, रसनार्ण, विसर्ग, से युक्त कर्णिका से संयुत स्वरों के द्वन्द्वों के स्फुरित केसरों से समन्वित, पत्रों में अन्दर रहने वाले पाँच कादि वर्ग और यझल आदि त्रिवर्ण को क्रम से दिशाओं में लान्त लाङ्गलि से युक्त भूपुर से समावृत एक पद्म की कल्पना करे और उस वर्णों के स्वरूप वाले देवता का पूजन करना चाहिये ।१०। आधार शक्ति से आरम्भ करके पीठ शक्ति के अवसाम पर्यन्त अभ्यर्चन करना चाहिए । मेधा, प्रज्ञा, प्रभा, विद्या, श्री, धृति, स्मृति, बुद्ध, विद्येश्वरी ये भारती की नौ शक्तियां कही गई हैं। वर्णाब्ज से आसन अर्पित करे और मूल मन्त्र के द्वारा मूर्ति की कल्पना करनी चाहिए ।११-१२। उसमें देवी का आवाहन करके फिर आवरणों के सहित देवी का अर्चन करे । पूर्व आवरण अङ्गो के द्वारा होता है और दूसरा दो-दो स्वरों के द्वारा हुआ करता है ।१३। आठ वर्गों से तीसरा आवरण होता है और शक्तियों के द्वारा चौथा आवरण हुआ करता है । पाँचवां आवरण मातृकाओं से होता है और छठवाँ लोकेश्वरों के द्वारा हुआ करता है ।१४। लोकपालायुधैः प्रोक्तं वज्राद्यैः सप्तमं ततः । विधिनानेन वर्णेशीमुपचारैः प्रपूजयेत् ।१५ व्यापिनी लापिनी पश्चात्पाविनी क्लेदिनी तथा । धारिणी मालिनी भूयो हसिनी शङ्खिनी स्मृता ॥१६ शुभ्राः पत्रेषु सम्पूज्या धृताक्षगुणपुस्तकाः । ब्राह्मी माहेश्वरी भूयः कौमारी वैष्णवी मता ।१७ वाराह्यनन्तरेन्द्राणी चामुण्डा सप्तमी मता । अष्टमी स्यान्महालक्ष्मीः प्रोक्तास्यु विश्वमातरः ।१८ दण्डं कमण्डलुं पश्चादक्षसूत्रमथाभयम् । विभ्रती कनकच्छाया ब्राह्मी कृष्णाजिनोज्ज्वला ।१६