शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ ] [ श्रीशारदा तिलक वर्णेश्वरी को प्रणाम करिये ।३२। न्यास और यजन प्रभृति सर्व पूर्व में कथित मार्ग द्वारा करना चाहिए। श्रेष्ठ साधक तारोत्थ कलाओं से उसका न्यास करे । ३३। वर्णाद्यास्तारसंयुक्ता न्यस्तव्यास्ता नमोन्विताः । ऋषिः प्रजापतिश्छन्दोगायत्रं समुदाहृतम्। ३४ कलात्मा वर्णजननी देवता शारदा स्मृता । ह्रस्वदीर्घान्तरगतैः षडङ्गं प्रणवै स्मृतम् । ३५ हस्तैः पद्मं रथाङ्गं गुणमथहरिणं पुस्तकं वर्णमालां टङ्कं । शुभ्रं कपालं वरममृतलसद्धेमकुम्भं वहन्तीम् । मुक्ता विद्युत्पयोदस्फटिकनवजपाबन्धूक पञ्चवक्त्रैः । त्र्यक्षैर्वक्षोजनम्रां सकलशशिनिभां शारदां ता नमामि । ३६ अर्चयेदुक्तमार्गेण शारदां सर्वकामदाम् । तार्तीयपूर्वां तां न्यस्यन्नमोऽन्तां रुद्रसंयुताम् । ३७ सधातुप्राणशक्त्यात्मयुक्तावादिषु ते क्रमात् । ऋषिः स्याद्दक्षिणामूर्तिर्गायत्रं छन्दईरितम् । ३८ अर्धनारीश्वरः प्रोक्तो देवता तन्त्रवेदिभिः । हृसा षड्दीर्घयुक्तेन कुर्यादङ्गानि देशिकः । ३६ अकारादि वर्णों के आदि वाली प्रणवसे युक्त तथा नमः-इस पद से समन्वित उनका न्यास करना चाहिये । इनका ऋषि प्रजापति है और छन्द गायत्र कहा गया है ।३४। कला के स्वरूप वाली, वर्णों को जनन करने वाली शारदाको इसका देवता बताया गया है । ह्रस्व और दीर्घ के अन्तर में स्थित प्रणवों के द्वारा षडङ्ग कहा गया है ।३५। अब ध्यान बतलाया जाता है-अपने कराम्बुजों के द्वारा पद्म, रथाङ्ग (चक्र)- गुण (अक्षमाला), हरिण, पुस्तक, वर्णमाला, टंक, शुभ्र कपाल- वरदान, अमृत से शोभित हेम के कुम्भ को वहन करती हुई, मुक्ता विद्युत पयोद, स्फटिक, नवीन जपा, बन्धूक पाँच मुखोंसे शोभित, तीन