शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ पटल ] १२६ नेत्रों से समन्वित-वक्षोज (स्तन) के भार से विनम्र-पूर्ण, चन्द्र के तुल्य उस शारदा देवी को प्रणाम करता हूँ ।२६। समस्त कामनाओं के प्रदान करने वाली शारदा देवी का वर्णित मार्ग द्वारा अर्चन करना चाहिए । जिसके पूर्व में तार्त्तीय (भैरव का एक भेद) है और जिसके अन्त में 'नमः'—यह पद है ऐसी रुद्र संयुता उसका न्यास करे ।३७। वे रुद्र धातु अर्थात् त्वचा, रुधिर, माँस, वेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र-प्राण शक्ति और आत्मा यकारादि व्यापक देशों में क्रम से जानने चाहिए । इसका ऋषि दक्षिणा मूर्ति है और छन्द गायत्र कहा गया है ।३८। इसका देवता तन्त्र शास्त्र के ज्ञाताओं द्वारा अर्ध नारीश्वर बताये गये हैं। देशिक को चाहिए कि वह छः अर्थात् आ, ई, ऊ, ऐ, औ, अः दीर्घ युक्त छैः से हकार तथा सकार से अंगों को करे ।३६। बन्धूककाञ्चननिभं रुचिराक्षमालां पाशाङ्कुशौ च वरद निजबाहुदण्डै । विभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र मर्द्धाम्बिकेयमनिशं वपुराश्रयामः ॥४० पूर्वोक्तेनैव मार्गेण पूजतेत्त यथाविधि । स्मराद्यां मातृकां न्यस्येत्केशवादिनमोन्विताम् ॥४१ साधातुप्राणशक्त्यात्मयुक्ता यादिषु विष्णवः । ऋषिः प्रजापतिः प्रोक्तो गायत्रं छन्द ईरितम् ।४२ अर्द्धलक्ष्मीर्हरिः साक्षाद्देवतात्र समीरिता । दीर्घयुक्तादिबीजेन षडङ्गानि समाचरेत् ॥४३ हस्तैर्विभत्सरसिजगदाशंखचक्राणि विद्यां- पद्मादर्शौ कनककलशं मेघविद्युद्विलासम् । वामोत्तुक्तस्तनमविरलाकल्पमाश्लेषलोभा- देकीभूतं वपुरवतु वः पुण्डरीकाक्षलक्ष्योः ॥४४ अब ध्यान बताया जाता है-बन्धूक और सुवर्ण के तुल्य, अपने बहु- दण्डों के द्वारा रुचिर अक्षमाला, पाश, अंकुश और वरदान को धारण