भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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१३२ [ श्री शारदा तिलक विद्यां च हस्तकमलैर्दधतीं त्रिनेत्रां ध्यायेत्समस्तजननीं नवचन्द्रचूडाम् ॥५६ ध्यान—विद्युल्लता के सदृश प्रभा से अन्विता, हिमवान् पर्वत के समान अर्थात् विशाल चार गजों के द्वारा सूड़ों के द्वारा समुद्धृत अमृत के कलशों से अभिषिञ्चन की गयी, कर कमलों से जपवटी, दो परम पुस्तक को धारण करने वाली, देदीप्यमान रत्नों के समुदाय से समु- ज्ज्वल, स्थूल कुचों के भार से नीचे की ओर झुकी हुई जगतों की स्वा- मिनी का ध्यान करना चाहिए ।५२। पूर्व में वर्णन की हुई विधि से कुसुम आदि उपचारों के द्वारा इनकी आराधना करनी चाहिए । स्म- राद्या-मंगलों की प्रदात्री मातृका शरीर में न्यास करे ।५३। इसका ऋषि सम्मोहन और छन्द गायत्र कहा जाता है। मन्त्र धारियों ने इसका देवता परा समस्त जननी बताया है ।५४। दीर्घों से युक्त स्मर से अंगों की कल्पना करनी चाहिए ।५५। ध्यान कहा जाता है—करोड़ों बाल सूर्यों के समान रुचिरा, हस्त कमलों के द्वारा स्फटिकाक्षों की माला, इक्षुजनित कोदण्ड स्मर (कामदेव) के पाँच वाण और विद्या को धारण करनी वाली, तीन नेत्रों से अन्वित, नवीन चन्द्र को चूड़ा में रखने वाली समस्तों को जन्म देने वाली का ध्यान करना चाहिए ।५६। अर्चनाविक्रियाः सर्वाः प्रोक्ताः पूर्वविधानतः । शक्तिश्रीकामबीजाढ्यां देवी वर्णतनुं भजेत् ।५७ ऋषिः पूर्वोदितश्छन्दोगायत्रं, देवता बुधैः । सम्मोहनी समुद्दिष्टा सर्वलोकवशङ्करी ।५८ आवर्तितैस्त्रिभिर्बीजैः षडङ्गानि प्रकल्पयेत् ।।५६ ध्यायेयमक्षवलयेक्षुशरासपाशान् पद्‌मद्वयाङ्‌कुशशरान्नवपुस्तकञ्च। आविभ्रतीं निजकरैररुणां कुचार्त्ता संमोहिनीं त्रिनयनां तरुणेन्दु- चूडाम् ।६० यजेदावरणैः सार्द्धमुमचारैः सुशोभनाम् । प्रपञ्चयाग वक्ष्यामि सच्चिदानन्दसिद्धिदम् ।६१