शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ पटल ] १३३ वेदादिशक्तिरजपा परमात्ममहामनुः । वह्नेर्जाया च कथिताः पञ्चमन्त्राः शुभावहाः ॥६२ तारशक्त्यादिकां न्यस्येदजपाऽऽत्मद्विठान्तिकाम्। मातृकामुक्तमार्गेण सृष्ट्या देहे विधानवित् ॥६३ ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दो गायत्रमीरितम्। समस्तवर्णसं व्याप्तं परं तेजोऽस्य देवता ॥६४ अर्चन आदि की पूर्ण क्रिया सभी पूर्व विधान से कही गयी है । शक्ति,श्री, काम बीजाद्या, वर्ण तनु वाली देवी का ध्यान करना चाहिये। ।५७। बुधों के द्वारा ऋषि पूर्व में कहा गया है। छन्द इसका गायत्र होता है और इसका देवता सब लोकों को वश में करने वाली सम्मोहनी बताया गया है ।५८। अवर्तित तीन बीजों से षडङ्गों की कल्पना करनी चाहिए ।५६। (ध्यान) अपने कर कमलों के द्वारा अक्ष वलय, इक्षु,धनुष, पाश, दो पद्म, अंकुश, शर, नव पुस्तक को धारण करने वाली, अरुण वर्ण वाली, पीन एवं उत्तुङ्ग कुच युग के भार से पीड़ित, तीन नयनों की धारिणी, तरुण चन्द्र को अपनी चूड़ा में रखने वाली सम्मोहनी का ध्यान करता हूँ ।६०। उपचारों के द्वारा आवरणों के सहित सुशोभना का अभ्यर्चन करना चाहिए । अब प्रपञ्चयाग के विषय में बतलाया जायेगा जो सच्चिदानन्द की सिद्धि के प्रदान करने वाला होता है । वेदादि प्रणव, शक्ति, अजपा-हंस, परमात्मा का महामन्त्र-सोऽहम्, वह्नि की जाया, स्वाहा के पाँच मन्त्र परम शुभके आवाहन करने वाले कहे गये हैं ।६१।६२। आत्मा-परमात्मा का मन्त्र, अजपा पूर्व में अभी बताया गया है, और अन्त में दो प्रकार वाली अर्थात् द्वन्द्व इस रूप वाली तारशक्ति आदिक का न्यास करे । विधान के ज्ञान रखने वाला पुरुष देह में सृजन से कथित मार्ग के द्वारा मातृका न्यास करे । इसका ऋषि ब्रह्मा कहे गए हैं और छन्द गायत्र बताया गया है । समस्त वर्णों में भली भाँति व्याप्त परम तेज ही इसका देवता होता है ।६३।६४।