शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१३४ ] [ श्री शारदा तिलक स्वाहाद्यैः पञ्चमनुभिः पञ्चाङ्गानि प्रकल्पयेत् । अस्त्रं दिक्षु बुधः कुर्याद्भूयो हरिहराक्षरैः ।६५ तारा दिपञ्चमनुभिः परिचीयमानं मानैरगम्यमनिशं जगदेकमूलम् । सच्चित्समस्तगमनश्वरमच्युतं तत्तेजः परम्भजत सान्द्रसुधाम्बुराशिम् ।।६६ पञ्चभूतमया वर्णा वर्गेभ्यः प्रागुदीरिताः । तस्माज ज्ञानेन्द्रियात्मानः प्रपञ्च मन्मयं विदुः ।६७ देहोऽपि तादृशस्तस्मिन्न्यसेद्वर्णान्विलोमतः । तत्तत्स्थानयुतान्मन्त्री जुहुयात् परतेजसि ।६८ एवं वर्णमयं होमं कृत्वा दिव्यतनुर्भवेत् । न्यस्य मन्त्री यथान्यायं देहे विश्वस्य मातरम् ।६६ जपेन्मन्त्रान्भजेद्देवान्यजेदग्निमनन्यधीः । द्रव्यैश्च जुहुयादग्नौ मन्त्रवित्तन्त्रचोदितैः ।७० स्वाहा आदि पाँच मन्त्रों के द्वारा पांच अंगों की कल्पना करनी चाहिए । बुध पुरुष अस्त्र को दिशाओं में करे और पुनः हरिहर अक्षरों के द्वारा करना चाहिए । ध्यान बतलाया जाता है—तारा आदि पाँच मन्त्रों के द्वारा परिचीयमान-मन्त्रों के द्वारा अगम्य-निरन्तर जगतों का एकमात्र मूल-सच्चित् समस्त में गमन करने वाले-अनश्वर अर्थात् नित्य एवं नाश रहित-अच्युत-सान्द्र (सघन) सुधा का महा सागर उस परम तेज का सेवन करो ।६५।६६। वर्ण पाँच भूतों के स्वरूप वाले होते हैं । जो पूर्व में ही वर्गों के द्वारा कहे गए हैं । इस कारण से ज्ञानेन्द्रियों के स्वरूप वाले प्रपंच को तन्मय कहा करते हैं ।६७। यह देह भी ठीक उसी भांति का होता है विलोमसे वर्णों का न्यास करना चाहिए । मन्त्रधारी उस-उस स्थान से युक्तों का पर तेज में हवन करे ।६८। इसी रीति से वर्णों के स्वरूप वाले होम को करके होम करने वाला दिव्य शरीर से युक्त हो जाया करता है । मन्त्र को धारण करने वाला पुरुष न्याय के