भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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षष्ठ पटल ] [ १३५ अनुसार विश्व की माता का देह में न्यास करे ।६६। अनन्यधी वाले को चाहिए कि वह मन्त्रों का जप करे—देवगणों का सेवन करे और उसको अग्नियों का यजन करना चाहिए । मन्त्रों के ज्ञान रखने वाले पुरुष को तन्त्र ग्रन्थों में बताये हुए द्रव्यों के द्वारा अग्नि में हवन करना चाहिए ।७०। अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षन्यग्रोधसमिधस्तिलाः । सिद्धार्थपायसाज्यानि द्रव्याण्यष्टौ विदुर्बुधाः ।७१ अमीभिर्जुहुयाल्लक्षं तदर्द्धं वा समाहितः । सर्वान्कामानवाप्नोति परां सिद्धिं च विन्दति ।७२ एभिरर्कसहस्राणि हुत्वा मन्त्रो विनाशयेत् । रिपून्क्षुद्रग्रहान्भूतान् ज्वराञ्छपांश्च पन्नगान् ।७३ मन्त्राणामयथावृत्तिप्रतिपाद्यसमुद्भवान् । विकारान्नाशयेदाशु होमोऽयं समुदीरितः ।७४ एभिस्त्रिमधुरोपेतै र्जुहुयाल्लक्षमानतः । अचिरादेव स सवेत्साक्षाद्भूमिपुरन्दरः ।७५ बुधजन हवन करने के लिए आठ द्रव्यों को बतलाते हैं—पीपल, गूलर, पाकड़ वट की समिधायें, तिल सिद्धार्थ, पायस और घृत ये आठ हैं ।७१। इन्हीं उक्त द्रव्योंके द्वारा एक लाख आहुतियाँ देनी चाहिए । अथवा परम सावधान होकर उसका आधा भाग अर्थात् पचास हजार आहुतियाँ देवे । ऐसा होम करने वाला पुरुष अपनी सभी मनोवञ्छित कामनाओं की प्राप्ति किया करता है और उसको परासिद्धि प्राप्त हो जाया करती है ।७२। इनके ही द्वारा बारह सहस्र आहुतियाँ देकर मन्त्र धारी शत्रुओं को, क्षुद्रग्रहों को, भूतों को ज्वरों को, शापों को, पलगों को विनष्ट कर दिया करता है ।७३। मन्त्रों की अथवा वृत्ति की प्रति- पत्ति से समुत्पन्न विकारों को बहुत ही शीघ्र यह होम नाश कर दिया करता है—ऐसा ही इसको कहा गया गया है ।७४। तीन मधुरों से उपेत इनके द्वारा एक लाख प्रमाण वाली आहुतियाँ देवे तो वह होम