शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ पटल } [ १३१ यहाँ पर मन्त्रधारी व्यक्ति अर्चन आदि सब कर्म का पूर्व की ही भाँति समाचरण करे । मन्त्र वेत्ताओं में श्रेष्ठ पुरुष तनु में पूर्व में शक्ति से समन्वित मातृका का न्यास करे ।४५। बुधों के द्वारा इसका ऋषि शक्ति, गायत्र छन्द और देवता सब प्रकार के सौभाग्यों का प्रदान करने वाली विश्व जननी को कहा गया है ।४६। बुद्ध पुरुष छै दीर्घ जो कि अभी पूर्व कहे गये हैं—अर्धेन्दु-विन्दु, इससे युक्त माय्य के स्वरूप वाले बीज से अंगों का समाचरण करे ।४७। अब ध्यान कहा जाता है—उगते हुए करोड़ों दिवाकरों के समान प्रतिभा, ऊँचे और पीन स्तनों से शोभित कर कमलों के द्वारा जपवटी, पाश, अंकुश, पुस्तक को धारण करने वाली, तीन नयनों से समन्वित, पद्मासन पर सुखपूर्वक विराज- मान जगदीश्वरी आपका कल्याण करे ।४८। पूर्वमें वर्णित विधि-विधान से ही प्रतिदिन देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए । और विधि के साथ ही तनु में श्रीबीज से सुसम्पन्ना मातृका का न्यास करे ।४६। इसका ऋषि भृगु-छन्द गायत्र और इसका देवता बुधों के द्वारा सम्पूर्ण सम्प- दाओं की आदि जगतों की नायिका कही गयी है ।५०। साधक पूर्व में प्रस्तुत बीज के द्वारा अङ्गों को करे ।५१। विद्युद्दामसमप्रभां हिमगिरिप्रख्यैश्चतुर्भिर्गजैः । शुण्डादण्डसमुद्धृतामृतघटैरासिच्यमानामिमाम् ।५१ बिभ्राणां करपङ्कजैर्जपवटीं पद्मद्वयं पुस्तकम् । भास्वद्रत्नसमुज्ज्वलां कुचनतां ध्यायेज्जगत्स्वामिनीम् ।५२ आराधयेदिमां प्रोक्तावर्त्मना कुसुमादिभिः । न्यसेत्स्कराद्यां वपुषि मातृकां मङ्गलप्रदाम् ।५३ ऋषिः संमोहनः प्रोक्तश्छन्दो गायत्रमुच्यते । देवता मंत्रिभिः प्रोक्ता समस्तजननी परा ।५४ स्मरेण दीर्घयुक्तेन विदध्यादङ्गकल्पनम् ।५५ बालार्ककोटिरुचिरां स्फटिकाक्षमालां कोदण्डमिक्षुजनितं स्मरपञ्चबाणान् ॥