शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें• १३८ ] [ श्री शारदा तिलक मेधा का लाभ करता है और शीघ्र ही किया करता है—इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है ।८५। पूर्व में वर्णित किए हुये पद्म को बनाकर पहिली की भाँति कुम्भ की संस्थापना करे । फिर मन्त्रधारी पुरुष क्षीर वाले वृक्षों के क्वाथ से उसे पूरित कर देवे ।८६। इसमें अष्टगन्ध को विलोडित करके उसे नौ प्रकार के रत्नों से समन्वित कर देवे । फिर उसमें पूर्व में कहे हुए मार्ग के द्वारा मातृका देवी का आवाहन करके उसका पूजन करना चाहिये ।८७। सहस्रासाधितैस्तोयैरभिषिञ्चेत्प्रियं नरम् । भानुवार' शेभे लग्ने ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।८८ गुरवे दक्षिणां दद्याद् भक्तियुक्तः स्वशक्तितः । रक्षाकरं विशेषेण कृत्वा द्रोहोपशान्तिदम् ।८६ ऐश्वर्यजननं पुंसां सर्वसौभाग्यसिद्धिदम् । अभिषेकमिमं प्राहर्विश्वसंवननं (मोहनं) परम् ।६० पूर्वोक्तं मण्डलं कृत्वा मन्त्री नवपदान्वितम् । मध्यादि स्थापयेत्तेषु पदेषु कलशान्नव ।६१ तन्तुभिर्वेष्टितान् शुद्धान्वहिश्चन्दनचर्चितान् । सुधूपवासितान् मन्त्री दूर्वाक्षतसमन्वितान् '६२ एक सहस्र वार साधित अर्थात् अभिमन्त्रित जल से अपने प्रिय मानव का अभिषिञ्चन करना चाहिए । रविवार के दिन किसी परम शुभ लग्न में करे और ब्राह्मणो को भी भोजन कराना चाहिए ।८८। भक्ति की भावना से समन्वित होकर अपनी शक्ति के अनुसार गुरुदेव को दक्षिणा समर्पित करे । यह द्रोह की उपशान्ति का देने वाला विशेष रूप से रक्षा के करने वाला होता है । यह पुरुष के ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाला है और सब सौभाग्य की सिद्धि का प्रदाता होता है । इस अभिषेक को मनीषीगण विश्व का पर मोहन करने वाला कहा करते हैं ।८६।६०। मन्त्रधारी पूर्वमें कथित नौ पदोंसे समन्वित मण्डल बनावे, मध्यादि में उन पदों में नौ कलशों की स्थापना करनी चाहिए ।६१।